भजन
टेक- रावली भक्त्ति को दाता गुण कांई
जग जन एक समाना ।
के तो निज भक्ति नहीं के झुंठा बाना ॥ टेर ॥
1- सतगुरु भेटयां से गुण कांई
सुधरा नहीं चेला ।
के तो निज सतगुरु नहीं
के जो मन नहीं झेला ॥ १ ॥
2- पारस भेटयां रा गुण कांई
पलट्या नीं लेवा ।
के तो निज पारस नहीं के
जो रह गया बिछेवा ॥२ ॥
3- मान सरोवर को गुण कांई
जहां हंसा दुखियारा ।
के तो निज सावर नहीं
के भेक दारा ।
4- पुष्पवास को गुण कांई
जहां है भंवर उदासा ।
के तो निज फलगा नहीं
के भंवरा बे विश्वासा ॥४ ॥
5- दाता पति को गुण काई
मन भर दान न दीना ।
कहे कबीर कैतो दानपति नहीं
कै कुछ कर्मों का होना ॥ ५ ॥
रावली भक्त्ति को दाता गुण कांई
जग जन एक समाना ।
के तो निज भक्ति नहीं के झुंठा बाना ॥
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