भजन
टेक- ऐसी भक्ति ना कीजिए
जग में होने हांसी ।
अन्तकाल जम मारही
देह देय गल फाँसी ॥टेर ॥
1- जैसे मंजारी परमोध से
झूठा वरत किया ।
सिर से दीपक डार के
मूसा यही लिया ॥ १ ॥
2- जैसे लाख पींघल चली
पावक के संगा ।
पल एक बाहर काढ़ता
हो जावे मद रक्षा ॥ 2 ॥
3- जैसे गेंद दरियाव में
जल में रहे भरपूरा ।
जल से बाहर निकल्या
ऊपर डारे धूरा ॥ ३ ॥
4- दीखत को बक उजलो
मन मैलो रे भाई
आंख मीच वो मुनि भयो
मच्छयाँ गटकाई ॥ ४ ॥
5- सेल संभालो साँच का
पाँचों से जड़िये ।
कहें कबीर गुरु ज्ञान से
जीवत ही भरिये ॥ ५ ॥
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