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सतगुरु हे अविनाशी मुक्ति रहत तव दासी लिरिक्स/ satguru he avinashi mukti rahat tav dasi lyrics

टेक- सतगुरु हे अविनाशी

मुक्ति रहत तव दासी ॥ टेर ॥ 


1- ब्रह्मा जाको , पार न पावे 

निरंजन करे खवासी । 

सहस सहस मुख निश दिन गावे 

सो भी घार न पासी ॥ १ ॥ 

सतगुरु हे अविनाशी

मुक्ति रहत तव दासी ॥


2- शङ्कर जाको ध्यान धरत हैं 

कहिये जोग अभ्यासी । 

चार वेद को भेद न जाने 

खोज खीज खप जासी ॥२ ||  

सतगुरु हे अविनाशी

मुक्ति रहत तव दासी ॥


3- ओंकार में भ्रमत डोले 

विष्णु फिरे उदासी । 

नाम पदारथ हाथ न आवे 

पड़े काल की फांसी || 3 || 

सतगुरु हे अविनाशी

मुक्ति रहत तव दासी ॥


4- अजर अमर एक प्रेम पुरुष है 

वो कहिये फुलवासी। 

कहत कबीर सुनो भाई साधो

अमरापुर को वासी ।

सतगुरु हे अविनाशी

मुक्ति रहत तव दासी ॥


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