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धरके सुनो अब ध्यान बानी का अर्थ बताऊँ तोय

भजन


टेक- धरके सुनो अब ध्यान बानी का अर्थ बताऊँ तोय ।


1- प्रथम आदि पुरुष ओंकारा, दूजी संग माया भई लारा

माया ने तीन गुण उपजाई, सत रज तम प्रिय नाम कहाया

ब्रह्म रजोगुण जान रचे है, जहान अर्थ यू आया है

है सतोगुण भगवान, सर्व घट थाया

तमोगुण शिव होय, कहूँ में तोय मान इतवारा

याही से उत्तपन्न प्रलय, सकल संसारा

जो तू पिंड से भये प्राणी, वो पिंडज खानी मानी

जो अंडा से पैदा होई, सो अंडज खानी सोई

जमी से जंगम भई, उत्तपन्न मेघ जलजार

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया, भई अवस्था चार

गुरु ने यू समझाया मोय ।


2- ब्रह्म वाच परा भई बानी, ईश्वर वाच प्रसन्ति ठानी

माया वाच बैखरी जानी, जीव वाच मध्यमा मानी

सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग चारा चारा

साम अथर्व ऋग्वेद यजुर्वेद यू चारा

तत्व तम परम ऐसी पद प्यारा प्यारा

चित मन बुद्ध अहंकार, लिखो ये चारा

अर्थ धर्म और काम, निज मोक्ष पदार्थ धामा

अब पांचो तत्व सुनाऊ, तेरा मन का भर्म मिटाऊँ

आकाश वायु तेज है, चौथा नीर निहार

पांचवा तत्व पृथ्वी भई, ऐसा अर्थ विचार

यह गुरु से मालूम होय ।


3- शब्द स्पर्श रूप रस गंधा, ये पांचो जीव के है फंदा

अन्न मन प्राण ज्ञान आनन्दा, जाने गुरुमुखी हरिजन बन्दा

कहूँ पांचो मुद्रा का भेद, मिटे सब खेद सुनो तुम ज्ञानी

है जिभ्या....... पर खेचरी मुद्रा ठानी

अगोचरी स्थान समझले कान, सुनो चित लाई

है भूचरी स्थान नासिका मांहि

मुद्रा चाचरी नेत्रा भाई, उनमुन ब्रह्मांड मांही

अब पांचो मुक्त सुनाऊ, तोय निज मत भेद बताऊ

सामीप्य सालोक्य सायोज्या, जीवन मुक्त विचार

मुक्त बंद में वो नही वो तो इनसे पार

वो निर्बन्धन निर्मोहा ।


4- शिक्षा व्याकरण ज्योतिष है भाई, छंद कल्प निरुक्त कहाई

छऊ अंग वेद के गाई, छऊ दर्शन अब कहूँ समझाई

सांख्य वेंशेषिक मीमांसा भाई, न्याय योग वेदांत सुनो चित लाई

उप कर्म अभ्यास मोक्ष दरसाई, अर्थवाद अपूर्वो उत्तपत्ति पाई

अब छः भृकुटि गाउँ, भिन्न भिन्न करके समझाऊ

बलि बजे गौ मति जानू, हंसमुखी साँचकर मानु

मकर मनी और शब्द मनी, एक मन्दर ततसार

मोटा पत्तल छोटा आदि, यह है छऊ आकार

यह अर्थ सतार्थ होय ।


5- सात समंदर सुनते जाओ, अपने दिल मे अर्थ जमाओ

लार छार दधि घृत कहाई, दुख ईख सूरा सुन भाई

नाड़ी चमड़ी रोम मांस यू आया, रक्त बिंद और हाड़ धात दर्शाया

आंख नाक मुख कान कंठ के माही, यह नो नाड़ी का ठीक ठिकाना याही

अब कमल आठ यह आया, खट मूल नाभ ठहराया

और आठ कर्म है न्यारा, कोई जानेगा जाननहारा

पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण, यह दिशा है चार

नेऋत्य वायु ईशान अग्नि, यह कोन है चार

यह आठो कौन यू होय ।


6- दसो देवी दस पवना होई, दसो देवता कहूँ अब तोई

ब्रह्म रुद्र और महादेवा, चाँद सूरज और इंद्र देवा

वरुण अग्नि यमराज, प्रजापत भाई

साडे तीन करोड़ है ये वदन पे थाई

हद माया जाल करो तुम ख्याल फसो मत कोई

है बेहद ब्रह्म विचार लिखो तत सोई

यह अर्थ किया ततसार कर दिल मे धारण धारा

नही मूर्ख के इतबारा वह डूबेगा मझधारा

दया भई गुरुदेव की मिटे तिमिर अज्ञान

जीवाराम निज स्वरूप में सदा भयो गलताना

यह पद पूर्ण छंद अब होय ।

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