वो घर सबसे न्यारा
साखी
1- जहाँ पुरुष सतभाव है तहाँ हंसन का वास ।
नही जा मन को नाम है नही तृष्णा नहीं आस ।।
2- हरष शोक वा घर नहीं नहीं लाभ नहीं हान ।
हंसा परमानंद में धरे पुरुष का ध्यान ।।
भजन
टेक- वो घर सबसे न्यारा रे संतों
जहाँ पूरण पुरुष हमारा , हो जी ॥
1 . जहाँ नहीं सुख दुख , साच झूठ ना
पाप पुण्य ना पसारा ।
चांद सूरज , दिवस नहीं रजनी
बिना ज्योत उजियारा ॥
वो घर सबसे न्यारा रे संतों
जहाँ पूरण पुरुष हमारा , हो जी ॥
2- ज्ञान ध्यान जप तप नहीं साधन
वेद पुरान नहीं बानी ।
रहनी गहनी , करनी कथनी , तासो सब हेरानी ॥
वो घर सबसे न्यारा रे संतों
जहाँ पूरण पुरुष हमारा , हो जी ॥
3 . ना अधर ना अविगत भाई , ना सूक्षम अस्थूला ।
ना निर्गुण ना , सिरगुण कहिये , या सब जग की भूला ॥
वो घर सबसे न्यारा रे संतों
जहाँ पूरण पुरुष हमारा , हो जी ॥
4 . घर नहीं अघर , बाहर नहीं भीतर , पिंड ब्रह्माण्ड में नांही ।
पांच तत्व गुण तीनों भी नांही , सुरत ( साकि ) शबद वां नाही ।
वो घर सबसे न्यारा रे संतों
जहाँ पूरण पुरुष हमारा , हो जी ॥
5 . मूल नहीं फूल , बीज नहीं बेला , बिना वृक्ष फल सोहे ।
ओहम सोहम अर्ध उर्ध बीच , स्वांसा लेखत ( देखत ) कोई ॥
वो घर सबसे न्यारा रे संतों
जहाँ पूरण पुरुष हमारा , हो जी ॥
6 . जहाँ पुरुष तहाँ कछु नहीं है , कहै कबीर हम जाना ।
हमरी सैण लखे जो कोई , मिले पुरुष निरबाना ॥
वो घर सबसे न्यारा रे संतों
जहाँ पूरण पुरुष हमारा , हो जी ॥
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