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अवधू , सो जोगी गुरु मेरा / avdhu so jogi guru mera

अवधू , सो जोगी गुरु मेरा


साखी


1- गंगा यमुना सरस्वती हो त्रिवेणी तीर । 

साहिब कबीर बेहद छके अम्मर होत शरीर । 


2- अनहद बाजे निर्झर झरे उपजे ब्रह्म ज्ञान । 

अविगत अंतर परगटै लागे परम ध्यान ।।.  


भजन 


टेक- रे अवधू , सो जोगी गुरु मेरा

जो इना पद को करेगा निवेड़ा । 


1 . बिना मूल एक दरकट ठाड़ा ( तरवर एक मूल बिन ठाड़ा ) 

बिना फूले फल लागे शाखा पत्र कछु नहीं वाके

अष्ट कमल दल साजे ... रे अवधू सो जोगी है गुरु मेरा


2- गगन मण्डल बिच उनमुख कुंवला , वां अमी का है वासा 

सुगुरा होय सो भर भर पीवे , नुगुरा जावेप्यासा 

रे अवधू सो जोगी है गुरु मेरा ।। 


3. शुन्न शिखर पर गौआ रे बियानी , धरती क्षीर जमाया 

माखन माखन तो संतों ने खाया , छाछ जगत बपराया

 रे अवधू सो जोगी है गुरु मेरा॥


4- उणा तरवर दो पंछी रे बैठा , एक गुरु एक चेला 

चेला रहा रे जगत चुनी खाए , गुरु निरन्तरखेला 

रे अवधू सो जोगी है गुरु मेरा ॥ 


5- पंछी को खोज और मीन को मारग , कहें कबीर दोई भारी

अपरंपार पार पुरुषोत्तम , या मूरत की बलिहारी

 रे अवधू सो जोगी है गुरु मेरा ।।


मालवी शब्द 

क्षीर - दूध

बपराया- वितरण करना , बांटना 

उणा - उस 


संक्षिप्त भावार्थ- इस भेद वाणी के जरिये से उस राह की अनुभूति को दर्शाया है जिसमें उस अलख तरुवर जो बिना मूल के फल फूल रहा है तथा उन्मुख कुऐ से अमृत रूपीजल के द्वारा विकसित है । उस तरुवर पर दोपंछी बैठे है। गुरु व चेला रूपी जिसमें गुरु निरन्तर विद्यमान है इस पद की खोज सदगुरु कबीर करने को कहते है जैसे पक्षी व मीन आगे बढ़ते हैं परन्तु उनका रास्ता मिट जाता ।


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