ऐसी म्हारी प्रीत निभावजो
साखी
1- प्रीती करो सुख लेने को सो सुख गयो हिराय ।
जैसे पाई छछंदरी पकड़ी साँप पछिताय ।।
2- जो छोड़े तो आंधरा खाए तो मरि जाय ।
ऐसे खंद छछंदरी दोउ भाति पछताय ॥
भजन
टेक- ऐसी म्हारी प्रीत निभावजो
हो निर्धन ( दुरबल ) का हो राम
भवसागर में भूलो मती
हो निर्धन ( दुरबल ) का हो राम
ऐसी म्हारी प्रीत निभावजो
1- तम तो झरकट हम बेलड़ी
रांगा तम से लिपटाए
तम तो ढलडो ने हम सूखी जावां
म्हारा काईं हो हवाल
ऐसी म्हारी प्रीत निभाव जो ॥
2 . तम तो समंदर हम माछली
रांगा तमारा हो माय
तम तो सुको ने हम मरीजाँवा
म्हारा काईं हो हवाल
ऐसा म्हारी प्रीत निभाव जो ॥
3 . तम तो बादल हम मोरीया
रांगा तम से हर्खाए / जुड़ाए
तम तो गरजो ( बरसो ) ने हम बोलिया
म्हारा काईं हो हवाल
ऐसा म्हारी प्रीत निभाव जो ॥
4- कहै हो कबीर धरमदास से
सुनलो चितमन लाय ।
गावे बजावे सुणे साम्हले
हंसा सत्लोक जाय ।
ऐसी म्हारी प्रीत निभावजो
संक्षिप्त भावार्थ - हमारी प्रीत लगाव जुड़ाव शब्दों के साथ कैसा हो इसके रूपक में प्रकृति में घटित होने वाली घटनाओं भयोध करवाया गया है । बिना पानी के मछली दरकट से लिपटी बैलड़ी मेध आगमन पर मोर का जुडार , इसी प्रकार हमारा र भौतिक अवस्था व संसार में रहकर शब्द का सुरत से आत्मा का परमात्मा से जीख का शिष से हो । यही सच्ची प्रीत है ।
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