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जोबन धन पावणा दिन चारा / joban dhan panna din chara

जोबन धन पावणा दिन चारा 


साखी


1- जहाँ आपा तहाँ आपदा , जहाँ संसे तहाँ शोक । 

कहै कबीर कैसे मिटे चारों धारज धौक ।। 


भजन


टेक- गरब करे सो गवाँरा 

जौबन धन पावणा दिन चारा ॥ 


1. पशु चाम की बनी पनईया , नौबत चढ़िया नगारा ।।

नर तेरी चाम काम नहीं आवे , बल जल होवे अंगारा ॥

गरब करे सो गवाँरा 

जौबन धन पावणा दिन चारा ॥ 


2 . पांच तत्व का बनिया पिंजरा भीतर भरिया भंगारा ।

ऊपर रंग सुरंग चढ़ाया , कारीगर करतारा ॥ 

गरब करे सो गवाँरा 

जौबन धन पावणा दिन चारा ॥ 


3. बीस भुजा दस मस्तक कहिए , कुटंब घणा परिवारा हे जी । 

ऐसा बड़ा बड़ा जोद्धा गरब माही गलग्या , भवसागर की धारा ॥ 

गरब करे सो गवाँरा 

जौबन धन पावणा दिन चारा ॥ 


4 . यो संसार ओस वालो मोती , ढलते नी लागे ऐतवारा हे जी । 

कहे कबीर सुनो भाई , हर भज उतरो पारा ॥ 

गरब करे सो गवाँरा 

जौबन धन पावणा दिन चारा ॥ 


मालवी शब्द - 

पावणा- मेहमान 

जोबन - जवानी , युवावस्था 

पिंजरा - शरीर


संक्षिप्त भावार्थ - कबीर साहब कहते हैं कि चार दिन के जीवन को चाकर अहंकार में मत डूब । पता नहीं ओंस के बूंद जैसा ढलते ( गिरते ) देर नहीं लगेगी अत : इस मानव जीवन में हम पर सेवा परहित व परमार्थ का कुछ काम कर ले , क्योंकि बड़े बड़े राजा - महाराज वैभव से परिपूर्ण वे गर्व के गर्भ में गल गये ।


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