बानी रे बानी म्हारा गुरु की निशानी
साखी
1- आकाशे ओधा कुवा पाताले पणिहार ।
जन हंसा कोई पीवई बिरला आदि विचार
2- तिल समान तो गाय है बछड़ा नौनी हाथ ।
मटकी भरी भरी दुहि किया पूँछ अट्ठारह हाथ ।।
भजन
टेक- बानी रे बानी म्हारा गुरु की निशानी ।
अलख जन्मिया उन घर पवन न पानी - हो जी।।
1 . धरती तो बरसे भींजे आसमाना ( अंबर भीगे ) ।
ओलती को पाणी गुरु म्हारा मगरी समाना - हो जी ॥
बानी रे बानी म्हारा गुरु की निशानी ।
अलख जन्मिया उन घर पवन न पानी - हो जी।।
2 . चालेगा पंछी ( पंथी ) ने थाकेगा बाटाँ ।
सोवेगा डोकरियो घोरेगा रंग खाटा - हो जी ।
बानी रे बानी म्हारा गुरु की निशानी ।
अलख जन्मिया उन घर पवन न पानी - हो जी।।
3 . धोबी धोवे सल्ला निचोवे ।
कपड़ा का ऊपर बागर सूके - हो जी ॥
बानी रे बानी म्हारा गुरु की निशानी ।
अलख जन्मिया उन घर पवन न पानी - हो जी।।
4. कहें हो कबीर सुणो भाई साधो ।
दुनिया जाणेगा म्हारी उल्टी सी बानी- हो जी ॥
बानी रे बानी म्हारा गुरु की निशानी ।
अलख जन्मिया उन घर पवन न पानी - हो जी।।
मालवी शब्द
ओलती - निचला तल छत का जहाँ पानी आता है ।
मगरी - ऊपर का ऊंचा छत
बाटा - रास्ता । डोकरियो - बजुर्ग ( वृद्ध आदमी )
खाटां - रस्सीवाली पलंग , सोने का चार पाए वाला
सल्ला - पत्थर कपड़े धोए जाने वाला , जिस पत्थर पर कपड़े धाते हैं ।
संक्षिप्त भावार्थ -इस उलटवासी में भी कबीर साहब ने विचारणीय शोचनीय बातें रखी है जिसमें धरती बरसती है और आसमान भीगता है । पंछी चलता है व रास्ता धकता है । पत्थर निचौता है व कपड़े पर बागर सुखती है । इनके शोचने , खोजने ईशारा करते हैं ।
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