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अमीया झरे हो साधू / amiya jhare ho sadhu

अमीया झरे हो साधू


साखी


1- पारख कीजे साधू की , साधू ही परखे कौन ।

गगन मण्डल में घर करे , अनहद राखे मौन ।।


2- अंतर कमल प्रकासिया , ब्रह्म वास तहं होय । 

मन भौरा तहँ लुबाविया , जान गए जन कोय ।। 


भजन


टेक- अमीया झरे हो साधू अमीया झरे । 

इणी भंवर गुफा का मांई अमीया झरे।।


1 . गगन मण्डल बीच उनमुख कुंवला ।

सत हो नाम ( सतकाम ) की वहाँ झड़ी हो झड़े । 

अमीया झरे हो साधू अमीया झरे । 

इणी भंवर गुफा का मांई अमीया झरे।।


2 . अखण्ड ब्रह्माण्ड में लागी रही ताली । 

सुखमना नारी वां घोर करे ॥ 

अमीया झरे हो साधू अमीया झरे । 

इणी भंवर गुफा का मांई अमीया झरे।।


3 . त्रिकूटी महल में वां बाजी रह्या बाजा । 

दसवां द्वार जईने खबर पड़े । 

अमीया झरे हो साधू अमीया झरे । 

इणी भंवर गुफा का मांई अमीया झरे।।


4 . कहै हो कबीर साहब सुनो रे भाई साधो । 

अमीया पीये वो नर काय को मरे ॥ 

अमीया झरे हो साधू अमीया झरे । 

इणी भंवर गुफा का मांई अमीया झरे।।


संक्षिप्त भावार्थ - सदगुरु कबीर सहाब ने हर घट में वाणी रूपी अमृत का झरण होता है , जिसे पीकर आत्मसात कर जीवन की सफलता व सार्थकता है और वह स्वयं व अनुभूति हर इंसान के जीवन में है । परन्तु जब खबर होगी जब जीवन की बाहरी यात्रा के साथ हम अपनी अन्तर की यात्रा भी शुरू करें । जिससे सदज्ञान व संत वाणी रूपी अमृत को पिया वह अमर हो गया क्योंकि वाणी तो अमर है ।


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