झाडू म्हारो फिरी रहयो
साखी
1- जोतू सांचा बाणिया सांची हाट लगाव ।
अंतर झाडू देयके कचरा देत बहाव ।
भजन
टेक- हाँ रे मनवा सत सरभंगी ( सब में ) म्हारो चतुर सुजान ।
झाडू म्हारो फिरी रहयो निर्गुण माय हारे भाई॥
1- मन पवन का झाडू बनाया , करनी रा कसणा लगाया ।
गुरु गम बंगड़ी लगी झाडू में , यां मन की मुक्ति जाण ॥
झाडू म्हारो फिरी रहयो निर्गुण माय हारे भाई॥
2- नाभी द्वादस चढ़ कर देखयो , देखयो घणो मैदान
बंक नाल से चढ्यो सरभंगी , झाड्यो दसमों द्वार ।।
झाडू म्हारो फिरी रहयो निर्गुण माय हारे भाई॥
3- अलियां गलियांशहर मंजारा , फिरी रही सुरता नार
कर कर चौकस ( पूरा , सही ) झाड्यो मैदान
यां पवन करेगा पहचान ॥
झाडू म्हारो फिरी रहयो निर्गुण माय हारे भाई॥
4 . करम भरम का झाड्या , कसौटा जग मैं दिया हंसा राल
नेमी नगर मात्रमजी को झाडू , पवन करेगा पहचान ॥
झाडू म्हारो फिरी रहयो निर्गुण माय हारे भाई॥
करम भरम का झाइया कसौटा ( करम भरम को इस कसौटी पर चढ़ाया तो यह सब भूल्या करम भरम खुद झाड़ गया ) , जुग में दियो हंसो राल ( फैलाना ) नेमी नगर मानम ( मानम संत भंगी समाज के संत थे , एक राजा के घर पर नौकर थे / झाडू लगाते थे , कबीर के भगत थे । ) जी का झाड़ , कोई संत करेगा पहचान , झाडू म्हारो..
संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में नियम से मानव शरीर रूपी नगर के अन्तर के कचरे को शब्द रूपी निगुण झाडू दूरको इस दस द्वारे रूपी अजब शहर के सन्दर बंगले को चौकम ( जागृत ) रहकरचकाचक साफ करने का संकेतकरतेहै ।
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