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जतन बिन बांवरा / jatan bin bawra

जतन बिन बांवरा 


साखी 


1- आठ पहर चौसठ घड़ी , लागि रहे अनुराग । 

हिरदे पलकन बिसरे , तब सांचा बैराग ।। 


भजन


टेक- जतन बिन बांवरा रे , मिरगाने खेत उजाड़ा ( चुगायो ) ।

मिरगा खेत उजाड़ा , जतन बिन मिरगा खेत उजाड़ा।।


1- पांच मिरगला पच्चीस मिरगली , या में तीन शिकारा । 

अपने अपने रस के भोगी , चुग रहे न्यारा न्यारा ।। 

जतन बिन बांवरा रे , मिरगाने खेत उजाड़ा ( चुगायो ) ।

मिरगा खेत उजाड़ा , जतन बिन मिरगा खेत उजाड़ा।।


2 . चल के झुंड मिरगा ( उड़ के झुंड चिरकन ) का रे आया

 आया ( बेठा ) खेत मंझारा । 

हों हों कर बाली ले भागे , मुख वांही रखवारा ॥ 

जतन बिन बांवरा रे , मिरगाने खेत उजाड़ा ( चुगायो ) ।

मिरगा खेत उजाड़ा , जतन बिन मिरगा खेत उजाड़ा।।


3. मारे मरे वो टरे नहीं टारे , बिगड़े नहीं बिडारा । 

अति प्रपंची महा दुख दायी , तीन लोक पची हारा ॥ 

जतन बिन बांवरा रे , मिरगाने खेत उजाड़ा ( चुगायो ) ।

मिरगा खेत उजाड़ा , जतन बिन मिरगा खेत उजाड़ा।।


4 . ज्ञान का भूला सूरत का रे चूका , गुरु शबद रखवारा । 

कहै कबीर सुनो भाई साधो ( कोई ) पहुँचे गुरुमुख प्यारा ॥

जतन बिन बांवरा रे , मिरगाने खेत उजाड़ा ( चुगायो ) ।

मिरगा खेत उजाड़ा , जतन बिन मिरगा खेत उजाड़ा।।


मालवी शब्द 

बाली - उंची / गेहूं की शूट 


संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में सदगुरु कबीर इस काया रूपी खेत के जतन की हिफाजत या रखवाली की बात करते हैं , किनसे ? हर घट या काया में मौजूद पंच विषय व पच्ची प्रकृति रूपी मृगव मृगनियों से । जो कि हमारे आँखों के सपने ही इस खेत का नुकसान करती है जो मारे से मरतीनहीं न हारे से हरती नहीं । उनहें ज्ञान व गुरु के शब्द से मोड़ाजा सकता है जो प्राप्त व शब्द के मिलाप से संभव है ऐसा कोई गुरुमुखी ही तार सकेगा । 


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