गुरु सरीका देव
साखी
1- गुरु गोविंद कर जानिये , रहिये शब्द समाय ।
मिले तो दण्डवत बंदगी ( नहि ) पल पल ध्यान लगाय।।
2- गुरु बड़े गोविंद से , मन में देख विचार ।
हरि सिरजे ते वार है , गुरु सिरजे तै पार ॥
भजन
टेक- गुरु सरीका देव हमारे मन भावे , सदा मन भावे ।
गुरु काटे करम ( भरम ) की जाल जीव सुख पावे।।
1- वा गुराजी की सैण समझकर धावे , समझकर पावे ।
वो नर चतुर ( संत ) सुजान , मन ( जीव ) उल्टावे ।।
गुरु सरीका देव हमारे मन भावे , सदा मन भावे ।
गुरु काटे करम ( भरम ) की जाल जीव सुख पावे।।
2- इंगला पिंगला नाड़ी सुषमना ' को लावे सुषमना को धावे ।
अरध - ऊरध ( आडा - उड़द ) के बीच , मन ठहरावे ॥
गुरु सरीका देव हमारे मन भावे , सदा मन भावे ।
गुरु काटे करम ( भरम ) की जाल जीव सुख पावे।।
3- एक अखण्डित नाथ चराचर धावे , चराचर धावे ।
भाई ( हाँ ) सकल ब्रह्म के माय वेद यूं गावे ।।
गुरु सरीका देव हमारे मन भावे , सदा मन भावे ।
गुरु काटे करम ( भरम ) की जाल जीव सुख पावे।।
4 . बोल्या ईश्वरदास भरम ने भगावे , भरम ने भगावे ।
शीतल चरणों के माय सदा सुख पावे ।।
गुरु सरीका देव हमारे मन भावे , सदा मन भावे ।
गुरु काटे करम ( भरम ) की जाल जीव सुख पावे।।
मालवी शब्द
सरीक - शरीर ।
साथी - हिस्सेदार , सहायक , मददगार ,
सरीखा - समान , तुल्य ,
अरध अंदर , भीतर , नीचे ,
उरध - ऊपर ,
चराचर चर और अचर , अस्थिर और स्थावर , जड़ और चेतन , जगत , संसार ,
सकल - सब , समस्त , कुल
संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में ईश्वरदास जी महाराज ने योग , ध्यान द्वारा संतों की सैण द्वारा मन को भौतिक पंच विषयों से मोड़कर , पलटाकर हम नव द्वार से ऊपर टिकाने का प्रयास करें जो सबका निजघर है । वेद शास्त्रों में दर्शाया है इसलिए वह घर शुषुम्ना का है जो ईगला , पिंगला नाड़ी के मध्य की स्थिति है जो अर्ध उर्द्ध के रूप में सभी में सर्वांगसम स्थिति में प्रवाहित है ।
आपको भजन अच्छा लगा हो या कोई त्रुटि दिखाई देती हो तो कमेंट करके जरूर बताये और blog को follow जरूर करे और आपको लिखित भजन एवं वीडियो social site पर भी मिल जायेंगे तो आप हमें वहाँ भी follow कर सकते है।
YOU TUBE - भजन वीडियो
FACEBOOK - FOLLOW
INSTAGRAM - FOLLOW
TELEGRAM - JOIN
TELEGRAM GROUP - JOIN
TWITTER - FOLLOW

0 टिप्पणियाँ