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भेला है पण मिलता नाही / bhela he pan milta nahi

भेला है पण मिलता नाही


साखी 


1- तीरथ  वृत करी जगमुआ जूडे पानी न्हाय । 

सतनाम जाने बिना काल जुगन जुग खाय । 


2- पुजा सेवा नेम व्रत , गुड़िया का सा खेल । 

जब लग पीव परसे नहीं , तब लग शंसै मैल 


भजन 


टेक- भेला है पण मिलता नाही

गुरु मुख ज्ञानी कोई ( कोई ) जाना

हे संतोरे भाई , ऐसा देशरे दिवाना॥


1- तीरथ करूं ना कोई , जप तप साजु

ना कोई धरूं मैं ध्याना । 

ऐसा होय खलक मांही खेलूं , ना मूरत अस्थाना । 

हे संतोरे भाई , ऐसा देशरे दिवाना॥


2- पग बिन पंथ , नैन बिन निरखू

बिन सरवण सुनो बैणा 

घ्रांण बिना हो सब लेत सुगंध्या , बिन रसना से रस पीवणा

हे संतोरे भाई , ऐसा देशरे दिवाना॥


3- सहज सरोवर सिमरथ हंसा , परबिन किया रे पियाना ।

मानसरोवर मोती चुगता ( मुगता ) निर्मल नीर निवाना

हे संतोरे भाई , ऐसा देशरे दिवाना॥


4 . यूँ जाण्या है जगदीस जुगत कर , पिंड बिना पुरुष पुराना ।

कहै बनानाथ ब्रह्म सकल में , घट बध कहो क्यों बैणा ॥ 

हे संतोरे भाई , ऐसा देशरे दिवाना॥


मालवी शब्द 

पियाना - ठिकाना 

निवान -कुआ

 

संक्षिप्त भावार्थ - इस शबद में नाथ सम्प्रदाय के श्रेष्ठ संत बनानाथ जी महाराज कहते हैं कि वह बिना पिंड का प्राण पुरुष सबमें मिला है । मौजूद होते हुए भी इस पंच भौतिक शरीर से अलग है जिसके बोध के लिए तीरथ वृत पूजा पाठ करने की जरूरत नहीं है , जिसे बिना जैज से देखा बिना कान से सुना , बिना नासिका से सूंघा , बिना रमना से रस पीना जैसो सहज किया द्वारा वह निर्भव निर से अपनी क्षुधा मिटा सके । क्यों कि हर घट में वह ब्रह्म मौजूद है हम किसे छोटा बड़ा या ऊंचा नींचा कहे ।


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