भजन गढ़ बाँध लो रे भाई
साखी
1- सुमिरन से मन लाइये , जैसे दीप पतंग ।
प्राण तजै छिन एक में , करत न मौरे अंग ॥
2- थोड़ा सुमिरण सुख घणा , जो करि जाने कोय ।
हल्दी लगे न फिटकरी , चौखा ही रंग होय।।
भजन
टेक- लागयो थारो जम संग बेर , काया
भजन गढ़ बांध लोरे भाई ।
सुमिरण गढ़ साध लोरे भाई।
1. म्हारा साधू भाई , गाफ़िल गाफ़िल कई फ़िरे रे ?
हे घर आँगन थारो बैर , संतों रे भाई
आठों आठों पहर भरम मांय भुल्यारे भाई
किस विध होगा थारी खैर , काया ?
भजन गढ़ बांध लो...॥
2. म्हारा साधू भाई , घड़ी बंधाई ले गुरु ज्ञान की
हे नीचल नीम रलाओ , संतोंरे भाई हाँ
अच्छा अच्छा नाम ( गुरुजी का नाम ) हृदय के माई ( भीतर ) राखो रे भाई
इस विध होगा थारी खैर , काया ।
भजन गढ़ बांध लो....॥
3- म्हारा साधूभाई , तन घोड़ा मन झामकी रे
सुरत पलीता घणा खाय , संतोंरे भाई हाँ
सुमिरण का तम सैल बनईलो साधो
इस विध जम ने भगाओ ( हटाओ ) , काया ॥
भजन गढ़ बांध लो...॥
4- म्हारे साधूभाई , ऐसा मनसुबा जो करे ( होएगा ) रे
घर घर आनंद होए , संतोंरे भाई
मनसुख दास शरण सदगुरु की भाई
आवागमन मिट जाए , काया ।
भजन गढ़ बांध लो...।।
मालवी शब्द
निचल - गहरी
नीम - नींव
सेल - चाबुक, बाण, चोट
झामकी - घोड़े की पीट पर विछाने वाला आसन , झीण , संडल
मनसूबा - किसी काम को करने का पक्का इरादा ( निश्चय ) मन को शुभ कर
संक्षिप्त भावार्थ - इसमें संतो ने भजनगड को बांधने या साधने की बात कही और इस विषय रूपी गाफिलता से पलटकर गहरी निष्ठा के साथ मन रूपी घोड़े पर सवार होकर सुरति जो इधर उधर दौड़ती है सुमिरन रुपी सेल से दुविधा रूपी यम को दूर करे और निर्भयता के घाट पर आ जाए ।
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