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अवधू वो घर एवा कहिये / avdhu wo ghar eva kahiye

अवधू वो घर एवा कहिये 


साखी 


1- तन थिर मन थिर , वचन थिर , सूरत निरत थिर होए । 

कहै कबीर वा पल को , कल्प न पावे कोई ।। 


2- ज्ञानी भूले ज्ञान कथि , निकट रहा निज रूप । 

बाहर खोजे बापूरे , और भीतर वस्तु अनूप ॥ 


भजन 


टेक- अवधू वो घर एवा कहिये । 

ज्यांको समज पकड़ थिर रहिये।।


1 . धर से अधर अधर से आगे हद बेहद से ऊँचा । 

नाद बिंद वहां कछुहन पूगे वोही फिरे मन पूछा । 

अवधू वो घर एवा कहिये । 


2 . बिना नैण में सब जुग देखा बिना सरवण सुणी बाणी ।

जीबिया का खटरस भोजन अमृत लिया गिनानी ॥ 

अवधू वो घर एवा कहिये । 


3 . बिना नासिका सांस सुवासा बिना इन्दरी रस भोगा । 

ना कोई पांच पचीस में प्रगटा ना कोई जोग बिजोगा । 

अवधू वो घर एवा कहिये । 


4 . नाम बिना एक नाम निरमला सतगुरु मोहे लिखाया । 

कहै कबीर नाम की महिमा ज्ञानी वे सो पाया ।

अवधू वो घर एवा कहिये । 


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