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वो सुमिरन इक न्यारा / wo sumiran ek nyara

वो सुमिरन इक न्यारा


साखी 


1- सुमिरण की सुधयूँ करो , ज्यों गागर पणिहारी

हाले डोले सूरत में , कहें कबीर विचार।।


2- सुमरण सुरति साधके , मुख से कछु न बोल ।

बाहर के पट देयके , अंतर के पट खोल ॥


3- ऐसा सुमिरण कीजिए , सहज रहे लौ लाय ।

बिन जिव्हा बिन तालवे , अंतर सुरत लगाय ॥


भजन


टेक- वो सुमिरन इक न्यारा रे संतों , वो सुमिरण इक न्यारा रे

जिन सुमिरण से पाप कटे है , होवे भव जल पारा रे॥

वो सुमिरन इक न्यारा रे


1-माला न कर मुख जिव्हा न हाले आप हि होत उच्चारा ।

सबहि के घट रचना रे लागी , तू क्यों नहीं समझे गंवारा ॥

वो सुमिरन इक न्यारा रे


2- अखण्ड तार टूटै नहीं कबहूं , सोहम् शबद उचारा है ।

ज्ञान आँख मोरे सतगुरू खोले , कोई जानेगा जाननहारा ॥

वो सुमिरन इक न्यारा रे


3- पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण , चारो दिशा पचिहारा रे ।

कहै कबीर सुणो भाई साधो , ऐसा शबद लेवो टकसारा रे ॥ 

वो सुमिरन इक न्यारा रे


मालवी शब्द- सुमिरन - याद , स्मरण । उचारा - उच्चारण प्रवाहित होना

संक्षिप्त भावार्थ - कबीर साहब इन टकसार वाणियों द्वारा सुमिरण जो हमेशा सभी मानव मात्र अखंड रूप से हो रहा है , उसे करने की जरूरत नहीं । ऐसे न्यारे सुमिरण का संदेश देते हैं जिसे बाहरी चारो दिशाओं या तीर्थ व्रत , पूजा , पाठ का नहीं होकर अपने अन्तर अनुभूति द्वारा ही संभव है । 

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