मन म्हारा थारे कंई विधि समझाऊँ
साखी
1-दौड़त - दौड़त दोडिया , जहाँ लग मन की दौड़
दौड़ि थके मन थिर भया , वस्तु ठौर की ठौर।।
2-जितनी लहर समुद्र की , उतनी मन की दौड़
सहजे हीरा निबजे , जब मन आवे ठौर।।
3-मन के मते न चालिए , मन के मते अनेक
जो मन पर असवार हे , सो साधु कोई एक ॥
भजन
टेक- मन म्हारा थारे कांई विधि समझाऊँ
थारे कुण विधि से अर्थाउ
थारा किए से में चलूं तो , सीधो नरक लइ जावे रे ।
मन म्हारा थारे कांई विधि समझाऊँ
1- घोड़ो होय तो लगाम लगाऊँ , ऊपर झीण कसाऊँ
होय सवार तेरे पर बैलूं , चाबुक दई ने चलाऊँ ।
मन म्हारा थारे कांई विधि समझाऊँ
2- हाथी होय तो जंजीर मंगाऊं , चारो पैर बंधाऊँ
होय महावत ऊपर बैढूं , अंकुस दे के चलाऊँ ।
मन म्हारा थारे कांई विधि समझाऊँ
3- लोहा होय तो एरण मंगाऊं , ऊपर धमन धमाऊँ
धमन की धण घौर मचाऊं , पानी कर पिघलाऊँ ।
मन म्हारा थारे कांई विधि समझाऊँ
4- सोना होय तो सुहाग मंगाऊं , बंक नाल रस लाऊं
ज्ञान शबद की फूंख लगाऊं , अंतर तार खिचाऊं ।
मन म्हारा थारे कांई विधि समझाऊँ
5- ज्ञानी न होय तो ज्ञान बताऊं , सत्य को मारग लखाऊं
कहै कबीर सुनो भई साधौ , अमरापुर पहुचाऊं ।
मन म्हारा थारे कांई विधि समझाऊँ
मालवी शब्द - अर्थाड - बताउं ।
झीण - घोड़े के ऊपर बिछाने का बिस्तर
धम्मण घमाड - लोहा गरम करने का यंत्र
संक्षिप्त भावार्थ- साहब कबीर मन को स्थिर करने की युक्ति के विभिन्न पहलुओं को जो गतिविधि भौतिक अन्य कठिन कार्यों को भी अपने अनुसार बना लेते हैं परन्तु मन को इस बाहरी क्रियाओं द्वारा नहीं भेजा जा सकता । जैसे घोड़ , हाथी को वश में किया जा सकता है । लोहे सोने की कठोरता व नरमता | की इच्छानुसार बताया जा सकता है । सत्य की राह के राहगीर नाम सत्यकाम द्वारा मन को मोड़ने का प्रयास करते हैं ।
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