सोदु सबद में कनिहारी
साखी
1. शब्द कहा से उठता ,कहो कहा को जाय
हाथ पांव वाके नहीं, कैसे पकड़ा जाय।।
2.धरती तो रोटी भई, कैसे पकड़ा जाय
पूछो अपने गुरु से,कहाँ बैठकर खाय।।
भजन-
टेक- सोदु सबद में कनिहारी भाई, ढूंढू सबद में कनिहारी
बिना डोर जल भरे कुएं पे, बिना सीस की पणिहारी।।
1.भव बिन खेत कुँवा बिन बाड़ी, जल बिन रेहट चले भारी
बिना बीज एक बाड़ी रे बोई, बिन पत्तो से बेल चली
बिना चोंच का मिरगला भाई, बाड़ी के चुगता घड़ी घड़ी ।
सोदु सबद में कनिहारी भाई
2.ले धनुष ओ चला शिकारी ,नही धनुष पर चाप चढ़ि
मिरगा मार भूमि पर रखिया , नही मिरग को चोंट लगी
मुआ मिरग का मांस लाया , उन नर की है देखो बलिहारी ।।
सोदु सबद में कनिहारी भाई
3.धड़ बिन शीश, शीश बिन गगरी , भर पानी चली पणिहारी
करू विनती उतारो गागरी , जेठ जेठानी मुसकानि।।
सोदु सबद में कनिहारी भाई
4.बिन अग्नि जल रसोई पकाई वा सास ननद के बहु प्यारी
देखत भूख भगी बालम की चतुर नार की चतुराई ।।
सोदु सबद में कनिहारी भाई
5.कहै कबीर सुणो भाई साधो, ई बाता है निर्वाणी
इणा सबद की करे खोजना, उसे समझना ब्रह्म ज्ञानी।।
सोदु सबद में कनिहारी भाई
मालवी शब्द - रहट- पानी निकालने का यंत्र
बाड़ी - बगीचा
मिरग - हिरन
चिरकला- एक प्रकार की चिड़िया
मुआ - मरा हुआ
पनिहारी - पानी भरने वाली
बालम - पति
प्रियतम - परमात्मा
संछिप्त भावार्थ- इस उलट वासी में साहब कबीर शोधन की खोजन की बात करते है और जो इस पद की खोज करता है वही सच्चा ब्रह्मा ज्ञानी है।जिसमे बिना जमीन के कुँवा है ओर उस कुए पर बिना शीश व धड़ की पणिहारी ,बिना रस्सी के पानी भरती है और कुए से फैली हरि भरी बाड़ी को मृग या पक्षी चिड़िया खाने चुगने आते है तो उस खेत का रखवाला धनुष बाण लेकर उस मृग को चिडिया को मार देता है और मांस अपनी पत्नी को देता हैं।परन्तु मृग को चोंट नही लगती ।यह बिना अग्नि व जल से भोजन बनाकर वह पणिहारी अपने प्रियतम को,खाविंद या पति को भोजन कराती है तो वह अपने प्रियतम की चतुर समझिक प्यारी स्त्री है।
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