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थारा गया खेत सब खाई / thara gaya khet sab khai

थारा गया खेत सब खाई


साखी


1- पाँच पच्चीस को मारिआ , पापी कहिए सोई ।

या परमारथ बूझके , पाप करे सब काये ।।


2- कहे कबीर पुकार के , चेते नाहि कोय ।

अबकी बिरिया सो चेतिए , सो साहिब का होय।।


3- आठ पहर यों ही गया , माया मोह जंजाल ।

सत्य नाम हिरदे नहीं , जीत लिया जम काल ।।


भजन 


टेक- थारो गया खेत सब खाई ( मिरगला ),थने कांई गम राखी भाई

थाने कांई गम राखी भाई,अरे मिरगला गया खेत थारो खाई।।

1- पाँच मिरगला पच्चीस मिरगली , रहता इस बन माहि ।

जागे जब तक नहीं खावे वो , सूता पाछे खाई ॥

थाने कांई गम राखी भाई,अरे मिरगला गया खेत थारो खाई।।


2- खेत धणी का मै रखवाला , बैठा अधबीच जाई ।

गुरूगम पत्थर ( भाटा ) लिया हाथ में , सबद सल्ल सन्नाई ।

थाने कांई गम राखी भाई,अरे मिरगला गया खेत थारो खाई।।


3- भाव का भाला सूरत कबाणी , भजनों की भीड रलाई

चार पहर निश्चय कर राखो , ज्योति में जोत समाई ।

थाने कांई गम राखी भाई,अरे मिरगला गया खेत थारो खाई।।


4- अबके ध्यान धरो मेरे भाई , फिर अवसर नहीं आई

कहै कबीर सुनो भाई साधौ , सबद में सुरत मिलाई ॥

थाने कांई गम राखी भाई,अरे मिरगला गया खेत थारो खाई।।


मालवी शब्द

सल्ल - शिला , पत्थर

सन्नाई - फेंकना

रलाई - फैलाना


संक्षिप्त भावार्थ- इस पद में कबीर साहब द्वारा मानव जीवन को पाकर ही हम जाग जाएं ताकि अंतर के पांच चोर से सुरक्षित रह सकें और यह तब संभव होगा जब हम जागे हुए हो ताकि शबद रूपी बाण या पत्थर से विषय रूपी चोर को भगा सकें और यह इसी मानव जीवन के रहते प्रेम का भाव का सदविचार का आचरण , निश्चय कर आपस में ज्योत से ज्योत जलाई जा सकती है । 

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