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आओ चढ़ीने मेरे भाई / aao chadi ne mere bhai

आओ चढ़ीने मेरे भाई


साखी


1- तिल समान तो गाय है , बछड़ा नौ - नौ हाथ ।

मटकी भर - भर दुई लिया , पूंछ अठारह हाथ ।।


2- तीन गुणन की बादरी , ज्यों तरूवर की छाँय ।

बाहर जायसो ऊबरे , भीजे मंदिर आय।।


भजन


टेक- आओ चढ़ीने मेरे भाई गगन बिच आओ

चढ़ी ने मेरे भाई ।


1 . चींटी चाली सासरे रे , नौ मन काजल सार

हाथी घोड़ा लिया बगल में , ऊँट लिया लटकाय ॥


2 . पैलांसे तो हम जनमिया पीछे बड़ा भाई ।

धूम धाम से पिता जनमिया , पीछे से आई मेरी माई ॥


3 . पेला से तो मई बिलोया , पीछे गऊवा दुहाई ।

बछड़ा वाका रहा पेट में , माखन हाट बिकाई ॥


4 . इण्डा तो म्हाने बोलत , सुनिया , बच्चा बोले नाहीं ।

कहै कबीर सुणो भाई साधो , पंडित के गम नाहि ॥


मालवी शब्द - 

चींटी- छोटी सी कीट ।

दुवाई- दुहना, दूध निकालकर

पैंला - प्रथम, पहला

बिलौटा - मथना, निकालना

अंडा - पक्षी का

सुनिया - सुनना


संक्षिप्त भावार्थ - इस उलटवासी में भी साहब कबीर जीवात्मा रूपी चींटी या सुरति बहुत से संघनों विशयों में छिपा होकर लोभ , मोह , काम , क्रोध को लेकर विषयों की हद से ऊपर उठने का संकेत करते हैं । इसकी खोज शोध की ओर प्रेरित करते हैं जैसे पहले हम जन्मे पीछे बड़ा भाई धूमधाम से पिता जनमिया फिर बाद में माई गाय का बछड़ा पेट में ही है और उसका माखन हाथो हाथ बिक रहा है । अण्डा बोलता है और बच्चा नहीं बोलता । इस प्रकार उलटवासी द्वारा भी साहब कबीर की अनुभूति गहरी व शोध का विषय बनी है ।


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