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मत कर माया को अहंकार / markar maya ko ahankar

मत कर माया को अहंकार


 साखी


1- काल चक्र चक्की चले , बहुत दिवस अरू रात 

अगुन सगुन दोई पाटला , जामे जीव पिसात ।।


2- जो ऊगे सो आथमें , फूले सो कुम्हलाय ।

जो चुने सो ढही पड़े , जन्में सो मरि जाय।।


3- निश्चय काल ग्रासहि बहुत रहा समझाय । 

कहें कबीर में का कहूँ , देखत हि पतियाय ।।


भजन


टेक- मतकर माया को अहंकार , मतकर काया को अभियान

काया गार से काची

कायागार से काची रे, जैसा ओस का मोती

झोंका पवन का लग जाय , झपका पवन का लग जाय

काया धूल हो जासी॥

मतकर माया को अहंकार , मतकर काया को अभियान

काया गार से काची


1- ऐसा सख्त था महाराज जिनका मुल्कों में नाम

जिन घर झूलता हाथी

जिन घर झूलता हाथी, उण घर दिया ना बाती ॥

मतकर माया को अहंकार , मतकर काया को अभियान

काया गार से काची


2- भरिया सिंदड़ा में तेल जासे रच्यो है सब खेल

जल रही दिया री बाती

जल रही दिया कि बाती, जैसा ओसरा मोती॥

मतकर माया को अहंकार , मतकर काया को अभियान

काया गार से काची


3- खुट गया सिंदड़ा रो तेल , बिखर गया सब नज खेल

बुझ गई दिया री बाती

बुझ गई दिया कि बाती, जैसा ओस रा मोती॥

मतकर माया को अहंकार , मतकर काया को अभियान

काया गार से काची

मतकर माया को अहंकार , मतकर काया को अभियान

काया गार से काची


4- ये तो लालों मैं का लाल , तेरा कौन क्या हवाल

जिनको जम ले जासी

जिनको जम ले जैसी, जैसा ओस रा मोती ॥

मतकर माया को अहंकार , मतकर काया को अभियान

काया गार से काची


5- झूठा माय थारा बाप , झूठा सकल परिवार

झूठी कूटता छाती

झूठी कूटता छाती, जैसा ओस रा मोती ।

मतकर माया को अहंकार , मतकर काया को अभियान

काया गार से काची


6- बोल्या भवानीनाथ गुरूजी ने सिर पे धरिया हाथ

जासे मुक्ति हो जासी

जासे मुक्ति हो जासी, जैसा ओसरा मोती ।

मतकर माया को अहंकार , मतकर काया को अभियान

काया गार से काची


मालवी शब्द

सख्त - कठोर मजबूत प्रभावशाली

मुल्को- अनेक राज्यों , देशों में ,

काची- अपरिपक , कच्ची । 

सिंदढ़ा - दिया ( मिट्टी का

हवाल - हालचाल


संक्षिप्त भावार्थ- भवानीनाथ महाराज कहते हैं कि इस नश्वर काया - माया का अहंकार , घमण्ड मत कर , पता नहीं कब हवा का झोंका आएगा सभीवैभवता , मान - सम्मान , धन - दौलत वहीं धरी रह जाएगी । इसलिए इन भौतिक वस्तुओं में परिवार नाति - पोती से कुछ जो लगाव रुझान है व आसक्तिमय है जिसमें कहीं न कहीं स्वार्थ है । पता नहीं कब हवा का झोंका लगेगा या शरीर रूपी दिये में चेतन रूपी  तेल होगा , प्रकाशित होगा जो खतम दिया बुझ जाएगा , अंधेरा हो जाएगा । अतः वैभवता में रहते हुए हम हल्के सरल बनकर गुरु शब्द के सानिध्य में रहें । यही मुक्त अवस्था है ।


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