सुरता मालन म्हारी
साखी
1- कथनी थोथी जगत में , करनी उत्तम सार ।
कहै कबीर करनी भली उतरे भवजल पार ।।
भजन
टेक- सुरता मालन म्हारी निज पथ बाड़ी म्हारी
बाड़ी ने मेघ वाली बोई हो
कर लीजो ज्ञान ध्यान निज काठा
थारी करनी पे ठहराई हो
गुरासा म्हारी , बाड़ी ने हिल मिल बोई हो ।।
1. नाभी कमल बीच उरध रोपिया
उनमुन स्वांसा में स्वांसा बंधी घट नाला
सोहंग शिखर गढ़ छाई हो ।
2 . सोहंग बीज आनंद अंकुरा
प्रेम पान गेराई हो
दुर्लभ पेड़ पंछम हंदी डाली
दसमां पे ठहराई हो ।
3. इणी काया में रतन नीपजे
हीरा हाट भराई हो
गुरु शरण में माली लिखे लिखमो
कमी ना राखी आबे कांई ।
मालवी शब्द
काढ़ा - मजबूत , गहरा
हंदी . मौजूद , लगी हुई , जैसी
संक्षिप्त भावार्थ - इस भजन में संत लिखमोजी महाराज करनी पर जोर देते हुए कहते हैं कि संसार रूपीबाड़ी मन द्वारा किए कर्म से बनी है । साथ ही स्वांस जो नाभि से उठता है और दसर्वे द्वार पर शिखर गढ़ पर चौह करता है और उसी के जरिये इस मानव जीवन में शुभ दस सतकर्म रूपी हीरा का सौदा करते हैं
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