पिया को खोज करे सो पावें
साखी
1- कबीर दुनिया देहरे , शीष नमावत जाय ।
हिरदे माहि हरि बसे , तू तहाँ लौ जाय ॥
भजन
टेक- पिया को खोज करे सो पावे ।
सो पिया तेरे घट में बिराजे
बाहर भटके कांई रे साधो भाई खोज करे सो पावे
1. ई करता बसिया घट भीतर कहत न कछु बन आवे ।
स्वांसा सार सुरत में रांखे त्रिकुटी ध्यान लगावे ॥
2. नाभि कमल स्थान जीव का , स्वांसा लग लग जावे ।
ठहरत नहीं पलक निशिवास , हाथ कौन विधि आवे ॥
3 . बंकनाल होई पवन चढ़ावे , गगन गुफा गहरावे ।
अजपा जाप जैसे बिन रसना , काल निकट नहीं आवे ॥
4- ऐसी रहणी रहे निसिवासर करम भरम बिसरावे ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो , बहुरिन भवजल आवे ।।
पिया को खोज करे सो पावे ।
संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में कबीर साहब ने उस पिया की खोज जो सवश करता है इसी घट में खोज करने का आव्हान किया है जो अपने भरम दुविधा से मुक्त होकर स्वांस के साथ जुड़ जाए जो हमेशा चलती रहती है ।
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