मन लागो मेरो यार फ़कीरी में
साखी
1- हरिजन हरि तो एक है , जो आपा मिट जाय ।
जा घट में आपा बसे , साहिब कहाँ समाय ।।
2- आपा सब ही जात है किया कराया सोय ।
आपा तजि हरि को भजे लाखन मध्ये कोय ॥
भजन
टेक- मन लागो मेरो यार फ़कीरी में
मन लागो मेरो यार गरीबी में
जो सुख पायो राम ( नाम ) भजन में
वो सुख नाहीं अमीरी में
मन लागो मेरो यार फ़कीरी में ।
1 . हाथ में तुंबा बगल में सोटा
चारों दिशा जागीरी में
मन लागो मेरो यार फ़कीरी में ।
2 . प्रेम नगर में रहनी हमारी
भली बनी आई सबूरी में
मन लागो मेरो यार फ़कीरी में ।
3 . आखिर यह तन खाक मिलेगा
क्यों फिरे मगरूरी में ?
मन लागो मेरो यार फ़कीरी में ।
4 . कहै कबीर सुनो भाई साधो
साहिब मिलेगा सबूरी में
मन लागो मेरो यार फ़कीरी में ।
मालवी शब्द
कोटि - सौ लाख , करोड़
निदान - अंत में , आखिर
तुंबा - खोखले कद्दू का बना बरतन , कमंडन
खाके - धुल , मिट्टी
सबूरी - सब्र , संतोष , धैर्य
मगरूरी- धमंड , अभिमान
संक्षिप्त भावार्थ - हर संतों का संदेश श्रद्धा , प्रेम , गरीबी व सबूरी का है जो लोभ मोह व आसक्तिमय तृष्णा को मोड़कर पलटकर ही संभव । और यही सच्ची फकीरी या चिन्ता मुक्त अवस्था है ।
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