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भक्ति राजी होई ने कीजे / bhakti raji hoi ne kije

भक्ति राजी होई ने कीजे


साखी


1- जैसी करनी आपनी , तैसा ही फल लेय 

( कूड़े ) बुरे करम कमाईके , साँई दोष न देय ।।


2- दाता नदियाँ एक सम , सब काहू को देय ।

हाथ कुम्भ जिसका जैसा , वैसा हि भर लेय ॥


भजन

टेक- जो तेरी इच्छा तिरवा की होय तो तुरत तैयारी कर लीजे रे

तन मन धन अरपो सतगुरु ने हिम्मत हार मत लीजे रे

भक्ति राजी होई ने कीजे रे 

यो मन थारो कियो नहीं माने दोष गुरा ने मत दीजे रे॥

भक्ति राजी होई ने कीजे रे ॥


1-पैलां दिल अपणो कर मोदो , पीछे पांव मत दीजे रे

सद्गुरू साहब मुक्ति के दाता , उनकी शरणों में रीजे रे ॥

भक्ति राजी होई ने कीजे रे ॥


2- इंगलारे पिंगला सुखमणा जोया , घर सुखमणा को लीजे रे

अजपा जाप जपो सुमिरण का , उनमुन आसन लीजे रे ।।

भक्ति राजी होई ने कीजे रे ॥


3- ओहम् सोहम् की रचना रे देखिले , माय मगन होई रीजे

दादूराम सतगुरू शरणों में जीव मुगत कर लीजे रे ॥

भक्ति राजी होई ने कीजे रे ॥


मालवी शब्द - पेंला- पहले ( प्रथम )

अरयो- अर्पित करना ।

तिखा की - पार होन की ।

लक्ष करे , हासिल करें ।

भोदो मजबूत , तैयार ।


संक्षिप्त भावार्थ- इस पद में दादूराम जी साहब ने निज घर भजन करने का सुष्मना है वहाँ मन को टिकाने का संकेत करते हैं । वह घाट सबका एक है ओर अर्द्ध - उर्खया ( ओह - सोह ) की रचना को निरंतर देखकर उस अखण्ड अजपा जाप में जुड़े जो हमेशा स्वतः होता है ।


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