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सैया निकस गये मैन लड़ी थी / sainya nikas gaye me na ladi thi

सैया निकस गये मैन लड़ी थी


साखी


1- मैं भंवरा तू बरजिया , बन - बन वासना लेय ।

अटकेगा कहुँ बेल सों , तड़प - तड़प जीव देय।।


2- बाड़ी के बीच भंवरा था कलियों की लेता वास ।

सोतो भंवरा उड़ि गया , तज बाड़ी की आस ।।


3- आस पास जोधा खड़े , सबै बजावत गाल ।

मंज महल से ले चला , ऐसा काल कराल ।।


भजन 


टेक- सैंया निकस गये मैं न लड़ी थी ।

दाता निकस गए मैं न लड़ी थी ।

मै ना लड़ी थी -2 सैंया निकस गए मैं न लड़ी थी ।


1 . शीश महल के दस दरवाजे

ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी ।।

सैंया निकस गये मैं न लड़ी थी ।


2 . ना मै बोली ना मैं चाली

ओढ़ि चुनरिया रही रे पड़ी थी ।

सैंया निकस गये मैं न लड़ी थी ।


3 . हमरे संग की सात सहेलियाँ 

न जाने कछु उनसे कही थी ।

सैंया निकस गये मैं न लड़ी थी ।


4 . कहत कमाली कबीर सा की चैली

ऐसी ब्याही से मै कुंवारी भली थी ।

सैंया निकस गये मैं न लड़ी थी ।


मालवी शब्द

सैया - पति , परमात्मा, सहेली

कुंवारी - बिन ब्याही अविवाहित

पत्नी - शादीशुदा


संक्षिप्त भावार्थ- इस पद में कबीर साहब की थैली कुमारी कहती है कि इस शरीर या काया के सृजनहार जीवात्मा निकल गईवयह शरीर वैसा ही पड़ा रहा जबकि उनसे ना मेरा को विवाद हुआ व पता नहीं इस शरीर रूपी रंगमहल का कौनसा दरवाजा खुला रहा जिसमें वो सेया निकल गए हमारी सात सहेलियाँ भी थी उन्होंने भी उन्हें नहीं देखा यदि वो मुझे छोड़कर चले गए इससे तो मैं बिन ब्याही या कुंवारी ही भली अच्छी थी जो बीच में छोड़कर चले गए ।


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