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साहिब ने भांग पिलाई / sahib ne bhang pilai

साहिब ने भांग पिलाई


साखी


1- विश्वासी हो गुरु भजे , लोहा कंचन होय ।

नाम भजे अनुराग से , हरष सोक नहीं दोय ॥


भजन


टेक- साहिब ( सतगुरा ) ने भांग पिलाई

अखियों में लालन छाई

हो सतगुरु ने भांग पिलाई

अखियों में लालन छाई


1 . पीकर प्याला हुआ दीवाना

घूम रहा जैसे मतवाला

जनम जनम का ताला खुल गया

मेरे ज्योत लगी घट माही ।।

अखियों में लालन छाई

हो सतगुरु ने भांग पिलाई

अखियों में लालन छाई


2 . झाड़ बिन्द और जीव चराचर में

फूलि रहा मेरा सांई

जहाँ देखूवो रीता ( खाली ) नाही

सब घट रहा समाई ।

अखियों में लालन छाई

हो सतगुरु ने भांग पिलाई

अखियों में लालन छाई


3 . गुरु रामानंद तुमरी बलिहारी

सिर पर ठोकर ऐसी दीन्ही

साहिब कबीर बकसीस कर दो

या अगम बाणी गाई ।।

अखियों में लालन छाई

हो सतगुरु ने भांग पिलाई

अखियों में लालन छाई


मालवी शब्द

झाड़ विंद- प्रकृति की रचना, पौधे , जन्तु

रीता - खाली

बकसीस - माफी


संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में साहब कबीर को सतगुरु द्वारा सतनाम का अंतर की भांग रूपी प्रेम का ऐसा प्याला पिलाया जिसका नशा निरंतर बढ़ता ही गयाऔर पहय्याला पीकर में मतवाला ( दीवाना ) होकर सभी ओर पूम रहा हूँ जहाँ मुझे प्रतिपद सभी जीवों में फल फूल रहा है कोर्ट पर खाली नहीं है उस अमृत रूपी बूंद से ।


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