रंग रंग का फूल खिले रे
साखी
1- देह माहि विदेह है , साहब सुरति सरूप ।
अनंत लोग में रम रहा , जाके रंग न रूप।।
2- आया बबूला प्रेम का , तिनका उड़ा अकास ।
तिनका तिनके से मिला , तिनका तिनके पास।।
3- जहाँ प्रेम तहाँ नेम नहीं , तहँ न बुद्धि व्यवहार ।
प्रेम मगन जब भया , कौन गिने तिथिवार ।।
भजन
टेक- म्हारी राम बाग गुलजार , म्हारी अजब बाग गुलजार
रंग रंग का फूल खिले रे।।
1- तखत चार चौरासी क्यारी , जिनकी सड़कां न्यारी रे न्यारी
पेड़ों से पेड़ बड़े रे , रंग रंग रा फूल खिले रे हो ।
म्हारी राम बाग गुलजार , म्हारी अजब बाग गुलजार
रंग रंग का फूल खिले रे।।
2- कुआ इणा बाग के माहि , धोरा तिन लाग्या वाके माहि
कुआ से बाग पिये रे , रंग - रंगरा फूल ......॥
म्हारी राम बाग गुलजार , म्हारी अजब बाग गुलजार
रंग रंग का फूल खिले रे।।
3- मालन इणा बाग के माहि , भर धोबा फूलन को लाई
मुख आगे तो लाइने धरे रे , रंग - रंग रा फूल .. II
म्हारी राम बाग गुलजार , म्हारी अजब बाग गुलजार
रंग रंग का फूल खिले रे।।
4- मनछा मालन मालारे पोई , दिल चावे लई जावो कोई
देवन के तो शीश चढ़े रे , रंग - रंग रा फूल ॥
म्हारी राम बाग गुलजार , म्हारी अजब बाग गुलजार
रंग रंग का फूल खिले रे।।
5- रामानंद गुरू माला रे दीनी दास कबीर ने प्रेम कर लीनी
घट माहि तो माला फिरे रे , रंग - रंगरा फूल . ।
म्हारी राम बाग गुलजार , म्हारी अजब बाग गुलजार
रंग रंग का फूल खिले रे।।
मालवी शब्द
गुलजार - फूलों का बगीचा
घोरा - रास्ता ( रस्सी का )
धोबा - दोनों हाथों का पस ( फेला दे )
संक्षिप्त भावार्थ - कबीर साहब ने घटमाहि की माला जो प्रेम से गुरु द्वारा दी आत्मसात की जो बहुत सुन्दर व अजब है , जिसमें अनेक प्रकार के फूल हैं । इस संसार रूपी बगीचे में या शरीर रूपी बगीचे में प्रति पल अलग - अलग विचार व सोच रूपी फूल खिलते हैं जो मनछा रूपी माखन माला बनाकर देवो को श्रद्धा सुमन प्रेषित करती है ।
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