लहरी अनहद उठे घट भीतर
साखी
1- अगम गहे अरू अकह कहे , अनहद भेद लहाय ।
अनभै वाणी अगम की , ले गये संग लगाय।।
2- हर्ष शौक वा घर नहीं , नहीं लाभ नहीं हानि ।
हंसा परमानंद में , धरे पुरूष को ध्यान ।।.
भजन
टेक- लहरी अनहद उठे घट भीतर फैली रही चौफैरी
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
1 . बिना मूल एक झरखट ठाड़ा , पान फूल बिन पहरी
साखा पत्र कछु नहीं वाके फैल रहा चौ फेरी रे ।।
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
लहरी अनहद उठे घट भीतर फैली रही चौफैरी
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
2 . उल्टा बाण गगन जई लागा वा बिच है एक डेरी
ऊणी हो डेरी में मेरे साहेब बिराजे वहाँ पर लागी लव मेरी ॥
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
लहरी अनहद उठे घट भीतर फैली रही चौफैरी
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
3 . उणी डेरी में ऐसा बाजा बाजे , बाजी रहा आठो पहरी
मरदंग ताल पखावज बाजे , मुरली बाजे घणी गहरी ।।
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
लहरी अनहद उठे घट भीतर फैली रही चौफैरी
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
4 . नौ सो नदियाँ निन्यानु सौ नाला , बह रहा आठो पहरी
आसपास रत्नागर सागर , बीच में अमृत डेरी ॥
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
लहरी अनहद उठे घट भीतर फैली रही चौफैरी
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
5 . सदगुरू के परताप सुमिरलो , पाई अगम की सैरी
कहें कबीर सुणो भई साधो , निरगुण माला फेरी ।।
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
लहरी अनहद उठे घट भीतर फैली रही चौफैरी
दीवाने लागी भजन धुन गहरी ।।
मालवी शब्द
झरकट - पेड़ , वृक्ष
संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में साहब ने अगम का संदेश निर्गुण रूपी माला के जरिये जो हमेशा स्वतःहर इंसान के घर में अखण्डित नाद धुन की सुरीली आवाज के रूप में बजती है जिसका दीदार कोई शब्द रूपी बाण लगने पर अंतर में पलटने पर संभव है ।
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