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मोरे सतगुरू भेद बतावे / more satguru bhed batave


मोरे सतगुरू भेद बतावे


साखी 


1- साधु शब्द समुंद्र है , जामे रतन भराय ।

मन्द भाग मिट्टी भरे , कंकर हाथ लगाय।।


2- साधु शब्द समुद्र सै , निपजत मोती माय ।

वस्तु ठिकाने पाईये , नालेखाले नाय।।


भजन


टेक- मोरे सतगुरू भेद बतावे मोरे साधु भाया

बिरखा अगम चढ़ि आई।।


1- पूरब दिशा से चले पुरवाई , पश्चिम लहर समाई

फर्र फर्र उड़े फव्वारा , अखण्ड धार बरसाई मोरे साधु भाई

बिरखा अगम चढ़ि आई।।

मोरे सतगुरू भेद बतावे मोरे साधु भाया

बिरखा अगम चढ़ि आई।।


2- दादुर मोर पपैया बोले , कोयल शब्द सुनाई

नहीं कोई बाव नहीं कोई बिजला ।

घरर - घरर घौराई मोरे साधु भाई ॥

बिरखा अगम चढ़ि आई।।

मोरे सतगुरू भेद बतावे मोरे साधु भाया

बिरखा अगम चढ़ि आई।।


3- नाभि कमल बिच होद भरिया है , नदियाँ अगम चढ़ि आई

उलट सुलट बह रही है नदियाँ , थारा रंग महल केरा माई ।।

मोरे साधु भाई बिरखा अगम चढ़ि आई।।

मोरे सतगुरू भेद बतावे मोरे साधु भाया

बिरखा अगम चढ़ि आई।।


4- कानड़ दास गुरू सुरा पूरा मिल गया, हीरारी खान ओलखाई 

रामदासजी ने वाणी परख लिया , भक्ति राम गुण गाई ।

मोरे साधु भाई बिरखा अगम चढ़ि आई।।

मोरे सतगुरू भेद बतावे मोरे साधु भाया

बिरखा अगम चढ़ि आई।।


मालवी शब्द

फरर - फरर - हवा के झोंके । 

बाव - बादल 

ओलखाई - बताना 

बिरखा - वर्षा 


संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में रामदासजी ने अगम की वर्षा का संदेश नौ हर इंसान के घर में अखण्ड रूप उलट खुलट रूप में उनकी नाभिकमल रूपी होद से उठता व बैठता है भक्ति गुण को दर्शाया है ।

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