पीले अमिरस धारा
साखी
1- अमृत कैरी मोटरी दीनी सद्गुरु खोल ।
आप सरीखा जो मिले ताहि पिला दे घोल।।
2- अमृत पीवे तेजना सद्गुरु लागा कान ।
वस्तु अगोचर मिल गई मन नही आवे आन।।
भजन
टेक - पीले अमिरस धारा गगन में झड़ी लगी ।
झड़ी लगी हा झड़ी लगी
पीले अमिरस धारा गगन में झड़ी लगी।।
1.बूंद का प्यासा घड़ा भर पाया
सपने में वो स्वाद न आया ।
कहो किसे कैसे समझावे
एक बूंद की तरण लगी ।
पीले अमिरस धारा गगन में झड़ी लगी ।
2.प्यास बिना क्या पीवेरे पानी
प्यासे के लिए है वो पानी ।
बिना अधिकारी कोई नहीं जाणी
अमृत रस की झड़ी लगी ॥
पीले अमिरस धारा गगन में झड़ी लगी ।
3.अमीरस पीवे अमर पद पावे
भव योनि में कबहू न आवे ।
जरा - मरण का दुःख नसावे
घटकी गगरिया भरण लगी
पीले अमिरस धारा गगन में झड़ी लगी ।
4.बून्द अमीरस गुरूजी की वाणी
जीवन रस्ता है यह पाणी।
कबीर संगत में हो हमारी
डाली प्रेम की हरी भरी।।
पीले अमिरस धारा गगन में झड़ी लगी ।
संक्षिप्त भावार्थ - हर इसान के गगन मण्डल से हमेशा ज्ञान की समझ की अमृत रूपी झड़ी रहती है । उसे हम कितना पान कर पाते है हमारे ऊपर निर्भर करता है । उस क्षुधा प्यास के मरम को जो प्यासा होता है वही जलता है , भूखा भूख के एहसास को , प्यास बूद के मरम को जानता है,जो प्यासा ना हो ,वह प्यास व भूख के मरम को नहीं जान सकता ।जिन्होने सन्तो की वाणी रूपी प्रेम का ,मरम का रस पीया जो हर मानव के जीवन का रास्ता है ,दरशन है ।
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