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गुरुजी ने दियो अमर नाम/ guruji ne diyo ammar naam

गुरुजी ने दियो अमर नाम गुरुजी


साखी


1- एक नाम को जानकर , दूजा देई बहाय

तीरथ व्रत जत तप नहीं , सब गुरू चरण में समाय ।।


2- सबको नाम सुनाऊँगा , जो आएगा पास 

शब्द हमारो सत्य है , दृढ़ राखो विश्वास ।।


भजन


टेक - गुरूजी ने दियो अमर नाम

गुरूजी सरका कोई नहीं

जिन घर भरिया खजीना भरपूर

कमी रे जहाँ है नहीं।


1. दाता बल हल उग्यो है भाण

चांद तारा छिप गया है

ऐसो जप तप योग अनेक

नाम तले दबि रिया ॥


2. दाता लागी समंद बीच लाय 

जलाया से न जले हाँ

 ऐसा बाचों वेद पुराण 

नाम गुरूजी बिन ना मिले ।


3. दाता नाम सरीखो यो दान

दियो अजाण ( अज्ञानी ) ने हाँ

 नुगरो / घुग्गू देखे तारा हंदी जोत

वो कंई जाने भाणने ॥


 4.दाता चिवतन चिंत अचेत

रटिलो निज नाम को है

ऐसा सही - सही केवे कबीर सा

 पहुँचेगा जिन धाम को ॥ 


संक्षिप्त भावार्थ- इस चितावनी शब्द में कबीर साहब ने गुरुजी द्वारा उस नाम शबद या धुन से जोड़कर जो सर्वमय व सर्वव्यापी है का बोध करवाया जो अनेक पूजा , पाठ , तीरथ , व्रत , जप - तप से ऊपर है जो निजधाम को पहुंचती है ।


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