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पाया है अब पाया है / paya he ab paya he

पाया है अब पाया है 


साखी 


1- ज्यौ नैना में पूतली , त्यो खालिक घट माहि ।

मूरख लोग न जानहि , बाहिर ढूँढण जाहि ॥ 


2- सबै खिलौने खांड के खांड खिलौना माहि 

तैसे सब जग ब्रह्म है ब्रह्म जगत के माहि ॥


भजन 


टेक- पाया है अब पाया है म्हाने सतगुरुभेद बताया है ।


1. माटी चाक कुणाल किरावे , बरतन नाना भांति बनावे

किसम किसम के रंग चढ़ावे ( लगावे ) , सबमे रंग समाया है ।। 

मोहे सतगुरु भेद बताया है . 


2. सोना जेवर घढ़े सोनारा , भांत भांत एक न्यारा न्यारा 

जब मैं बेचन गये बज़ारा , एकभाव सब आया है । 

मोहे सतगुरु भेद बताया है . 


3- चतुर जुलाहा तनिया ताना , वस्त्र बुनिया बहुत सुहाना

एक ही ताना एक ही बाना , सूत में सूत मिलाया है ।

मोहे सतगुरुभेद बताया है .... 


4- सुर नर मुनि जन जीव जहाना ऊंच नीच सब भेद मिटाना

ब्रह्मानंद सब रूप समाना , सब में एक समाया है ।

मोहे सतगुरु भेद बताया है .... 


मालवी शब्द

नानाभांति - अनेक प्रकार से 

किसम किसम-  अलग अलग तरह के 

जेवर - गहने

बुनिया - बुनना


संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में ब्रह्मानन्द जी ने समाज में व्याप्त

विषमताओं को वर्ण भेद , जाति भेद को मिटाने की बात करते 

हैं क्योंकि हर मानव में एक ही नुर एक ही रंग ( साहेबी ) समाई 

है । चाहे बरतन को साईज व बनावट अलग हो पर मिट्टी तो एक ही है । सोने के आभूषणों की साईज बनावट 

अलग हो पर उनका सभी का मोल ( कीमत ) एक ही 

होती है । मानव मात्र का ताना बाना एक ही सुत से बना 

है।


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