ई नी जाणे नेठूनी जाणे
साखी
घट में है सूझे नहीं , मुख सो कहा नहीं जाय ।
मिला रहा है वो न मिले , तांसो कहाँ बसाय ॥
2- बसे अपिण्डी पिण्ड में , ताको लखे न कोय ।
कहे कबीरा संतजन , बड़ा अचम्भा होय।।
3- समदर्शी सतगुरू किया , मेटा भरम अंधियार ।
जहाँ देखो तहँ एकहि , साहैब का दीदार ।।
भजन
टेक- ई नी जाणे नेठू नी जाणे , नी जाणे गुरूमाला में
जब तक पैरी तब तक फेरी , तोड़ फेंक दी जाला में ।
1- इणा कुतरा के काँच बतायो , ऊबी लाग्यो इणा चालां में
नी जाणे ऊ निरखन में , नी जाणे ऊ परखण में )
बाहर भीतर दीसण लागे , भूंस रयो गलियारा में ।
ई नी जाणे नेठू नी जाणे , नी जाणे गुरूमाला में
जब तक पैरी तब तक फेरी , तोड़ फेंक दी जाला में ।
2- इणा बांदरा के हीरो मिल गयो , नी जाणे उन मोतिन में
खारे मीठा वो लागो चाखवा में , धरि लियो मुख आल्या में ।
ई नी जाणे नेठू नी जाणे , नी जाणे गुरूमाला में
जब तक पैरी तब तक फेरी , तोड़ फेंक दी जाला में ।
3. इणी भैंस रांड के गैणो पेरायो , वानी जाणे गेणा में
दईने रमल को लागी रे लोटवा , लोट रई नज कीचड़ में ।
ई नी जाणे नेठू नी जाणे , नी जाणे गुरूमाला में
जब तक पैरी तब तक फेरी , तोड़ फेंक दी जाला में ।
4- इणा गदड़ा के गंगाजी रे लेईग्या , ऊनी जाणे न्हावण में
( गदड़ा के चारों धाम घुमायो , नी जाणे ऊणा तीरथ में )
कहै कबीर सुणो भई साधो , लोट रयो नज घूड़ा में ।
ई नी जाणे नेठू नी जाणे , नी जाणे गुरूमाला में
जब तक पैरी तब तक फेरी , तोड़ फेंक दी जाला में ।
मालवी शब्द
कुतरा - कुत्ता
उबी - वह भी ,
चाला मे - काम ,
नेठूनी- बिल्कुल नही
पैरी - पहनी ।
जाला - झाड़ी कांटो में ।
भूसरियो - भौक रहा ,
चाखवा - चखना ,
गदड़ा - गधा
धुडा - खाद का गहा जिसमें गंदगी डालते है ।
संक्षिप्त भावार्थ - इस रूपक में साहब कबीर ने ऐसे जीव जो काफी समझा देने के बाद भी फिर से नासमझी में उलझ जाते हैं व फिर अनेक विषयी रूपी आसक्ति में बंध जाते हैं ।
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