घणा दिन सो लियो रे
साखी
1- दिवस गमाया खाय के , रेण गंवाई सोय
हीरा जनम अमोल था , कोड़ी बदले खोय ||
2- जागण ही मे सोवणा , सोवण ही में राज ।
एक तो वन में घर करे , घर में रहे बेराग।।
भजन
टेक- घणा दिन सो लियो रे , अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
1- पहले सोयो माता के गरभ में , औंधे मुख तू झूला ।
कौल किया था भजन करूँगा , बाहर आकर भूला
जनम थारो हो गयो रे अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
घणा दिन सो लियो रे , अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
2- दूजे सोयो माता कि गोद में , दूध पियार मुस्काया ।
बहन , भुआ थारी लाड लडावे , झूला दिया बंधाई
बधावो थारो हो रयो रे अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
घणा दिन सो लियो रे , अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
3. तीजे सोयो तिरिया की सेज पे , गले में बहियाँ डाली ।
मोह मद में फंसी गयो , तू भूल गया सब कोल
ब्याव थारो हो गयो रे अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
घणा दिन सो लियो रे , अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
4. चिता को सोणो बाकी रे रईग्यो , सब जगह लियो है सोई ॥
कहैं कबीर थारे जागण की , तू जाग्यो नहीं गंवार
मरण थारो हो रयो अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
घणा दिन सो लियो रे , अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
5. चौथे सोयो जाए शमसाना ( मसाना ) , लम्बा पैर पसारी ।
कहैं कबीर थारे जागण की , तू जाग्यो नहीं गंवार
मरण थारो हो रयो अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
घणा दिन सो लियो रे , अब तू जाग मुसाफिर जाग ।
मालवी शब्द
कोल - बादा ।
बधावा - उत्साह
ब्याव - विवाह ।
जाग्यो - जागना
मसाणा - शमशान
लाढ - प्रेम, आत्मीय
संक्षिप्त भावार्थ - इस भजन में कबीर साहब ने मानव जीवन की चारों अवस्थाओं की अज्ञानता या सोई दुई अवस्था का निरुपण किया है । इर इंसान की सांसारिक चारो अवस्थाओं का बारीकी से प्रत्यक्षानुभूति कर कहा है कि पहली अवस्था सबकी मानव मात्र की सोई हुई अवस्था माँ के गर्भ में , दूसरीमाँ के गोद में , तीसरी तिरिया के संग व अंतिम चौथी सोने की अवस्था श्मशान में चित्ता की , वहाँ के बाद फिर कभी उठना बैठना या जागना नहीं ।
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