घूँघट के पट खोल
साखी
1- घट बिन कहुँ न देखिये राम रहा भरपुर ।
जिन जाना तिन पास है , दूर कहाँ तो दूर ।।
2- कबीर जग के जोहरी , घट की आँखे खोल ।
तुला संभार विवेक की तौलो शब्द अमोल।।
3- पारख कीजे साधु की , साधहि परखे कौन ।
गगन मंडल में घर करें , अनहद राखे मौन ॥
भजन
टेक- घूंघट के पट खोल रे तोकों पीव मिलेंगे ।
1- घट - घट में वह सांई बसत है , कटुक वचन मत बोल रे ॥
घूंघट के पट खोल रे तोकों पीव मिलेंगे ।
2- धन यौवन का गरब न कीजे , झूठा है पचरंग चोल रे ॥
घूंघट के पट खोल रे तोकों पीव मिलेंगे ।
3. सुन्न महल में दिवला रे बारी ले आसा से मत डोल रे ॥
घूंघट के पट खोल रे तोकों पीव मिलेंगे ।
4. घट - घट में वह रमै निरंतर पिया पाओ अनमोलरे ।।
घूंघट के पट खोल रे तोकों पीव मिलेंगे ।
5. कहत कबीर आनन्द भयो है , बाजत अनहद ढोलरे ॥
घूंघट के पट खोल रे तोकों पीव मिलेंगे ।
मालवी शब्द
पट - दरवाजे
घूंघट - एक प्रकार का परदा
पचरंग - पांचरंग
बौल - बोला ( शरीर )
संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में कबीर साहब अपने अंतर के पट ( दरवाजे ) खोलने का संकेत करते हैं जहाँ हमेशा अनहद रूपी ढोल नंगारे अखंड रूप से बनते हैं जो हर घर में व्याप्त है यह तभी संभव है जब हम भौतिक ऐश्वर्यता , वैभवता के घमण्ड से मुक्त होकर सरल , सहज व निर्मल बनकर कटु वचन को त्याग कर हमने जो आवरण अपने ऊपर चढ़ा रखे हैं , उतारे ताकि उस जीव का साई का दीदार घर में कर सकें ।
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