म्हारा सतगुरु बणिया भेदिया
साखी
1- गूंगा हुआ जीभ से , बहरा हुआ है कान ।
पावन ते पंगुला भया , सतगुरू मारा बाण।।
2- ज्ञान कमल फूलो गुरू , तन तरकश मन तीर
झलक बहे तत सार का , मारा हलक कबीर ।।
भजन
टेक- म्हारा सतगुरू बणिया भेदिया , म्हारी नाड़ी रे पकड़ी हाँ ।
उन नाड़ी में लहर उपजे हियो हिलोरो खाय
गुरु म्हाने ज्ञान दईग्याई
म्हारे तन बिच दियो लखाय सुमिरन चेतन कर गिया।
1- म्हारा सतगुरू आँगन रूखड़ी , लीजो रे सब कोय
अवगुण ऊपर गुण करें , म्हारा सभी पाप झड़ि जाय ।
गुरू म्हने चेतन कर गया ।
म्हारे तन बिच दियो लखाय सुमिरन चेतन कर गिया।
2- म्हारा सतगुरू सोना सोलमों रति नी लागे कांई ( दाग )
सतगुरू भाला रोपिया , म्हारें लगे कलेजारे माय
गुरू म्हारे घायल करि गिया ॥
म्हारे तन बिच दियो लखाय सुमिरन चेतन कर गिया।
3- भाव रूख फैले घणो रे , फैली रहयो चौ फेर
भरी सभा में बांट जोऊँ म्हारी आनंद सभा में बाट जो
ऊँ म्हारा बंटया घणेला होय ॥ गुरू म्हारे घायल करि गिया ॥
म्हारे तन बिच दियो लखाय सुमिरन चेतन कर गिया।
4- अरे मन मोइनो चोर लो , सूरता रो करलो तार
सेवा गुरू अमृत को प्यालो , दियोजी म्हाने पिलाय
गुरू म्हारे घायल करि गया ।
म्हारे तन बिच दियो लखाय सुमिरन चेतन कर गिया।
मालवी शब्द
हिकोरो - हिलोर , लहर उमंग ।
रूखड़ी - जड़ दवाई
संक्षिप्त भावार्थ - इसमें संतों की चितावणी है सतगुरु के आंगण में वह जड़ी दवा है , नाम की , सतकाम की जिससे सभी रोग कटते हैं जिसमें कोई काई या दाग नही लगता।बेदाग है पर नतु यह स्थिति तब बनेगी जब कोई शब्द की चोंट अंतर मेला । और हम अंतर से घायल हो जाएं और उस भाव की प्रेम की लहर के जरिये प्याला सबको पिला सकें ।
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