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चेत रे नर चेत रे थारो चिड़िया चुग गई खेत / chet re nar chet re tharo chidiya chug gai khet

चेत रे नर चेत रे थारो चिड़िया चुग गई खेत


साखी 


1- आछे दिन पाछै गये

गुरू से किया नहीं हेत ।

अब पछताए होत का

 जब चिड़िया चुग गई खेत।।


2- चंचल मनवा चेतरे

सोवे क्यों अनजान ।

जम घर से जब ले जाएगा

 पड़ा रहेगाम्यान ।।


भजन


टेक- चेत रे नर चेत रे

थारो चिड़िया चुग गई खेत रे

नर नुगरारे अब तो मन में चेत रे . ॥


1. गुरू के नाम से आंटीरे 

थारी कुण चढ़ावे घाँटी रे ।

नर नुगरा रे

अब तो मन में चेत रे .....॥


2. गुरूजी बतावेगा भेदरे

 जासे कटे करम की रेख रे ।

नर नुगरा रे ...

 अब तो मन में चेत रे .....॥


3. गुरूजी बताएगा भेद रे

यासे छूटे जनम की कैद रे ।

नर नुगरा रे . ....

 अब तो मन में चेतरे .....॥


4 . समझ देखिले आँखिरे तू

 गाडर खईग्यो आखीरे ।

नर नुगरा रे ... 

अब तो मन में चेतरे . 


5 . गुरू चरणदास की वाणी रे 

सार शबद पहचाणीरे ।

नर नुगरा रे ... 

अब तो मन में चेत रे .....॥


मालवी शब्द

आटी - विरोध , दूरी । 

कुण - कौन । 

घाटी - चढ़ाव , कठिन । 

गाड़र - भेड़ 


संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में चरणदासजी साहब ने सार शब्द से जुड़कर इन्साफ के बीच अनेक प्रकार की दुविधा आंटी को गुरु के शब्द से प्रेम , भाईचारा स्थापित किया जाकर अपनी रहणी - गहणी , खान - पान के सुधार पर जोर दिया है ।


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चेत रे नर चेत रे

Chet re nar chet re

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