' तन राम का मंदिर '
साखी
1- पाँच तत्व का पूतला , रज बिरज की बूंद ।
एके घाटी नीसरा , ब्राह्मण क्षत्री शूद।।
2- देह निरंतर देहंरा , तामें प्रत्यक्ष देव ।
राम नाम सुमरन करो , क्या पाथर की सेव।।
भजन
टेक- तन राम का मंदिर साधु , भाई काया राम का मंदिर
इणा मंदिर की शोभा प्यारी , शोभा अजब है सुन्दर।।
तन राम का मंदिर
1- पाँच तीन मिल बना है मंदिर , कारीगर घड़ा घड़न्दर
नौ दर खुल्ले दसवाँ बंदकर , कुदरत कला कलंदर ।
तन राम का मंदिर
2- इणा मंदिर में उनमुख कुवला , वाँ है सात समंदर
जो संत अमृत पीये कुँए से , वाके भाग बुलन्दर ।।
तन राम का मंदिर
3- अनहद घण्टा बाजे मंदर में , चढ़ि देखो शून्य अंबर
अखण्ड रोशनी होवे दिन राती , जैसे रोशनी चंदर ।।
तन राम का मंदिर
4- बैठे है ठाकुर मंदिर में , ध्यान धरो अपने अंदर
कहें कबीर करो नेम से पूजा , जब दरसेगा घट अंदर ।।
तन राम का मंदिर
मालवी शब्द
जद - जब ।
म्हारो - हमारो , मेरा ।
पेरयो - पहनना
नीसरा - उतरना
उन्मुख शक्ल - उल्टा हुआ
संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में कबीर साहब ने मानव के शरीर ( काया ) को ही सुन्दर शोभायमान मंदिर बताया है जो कुदरती है । और इस मंदिर की रचना चतुर कारीगर ने सुन्दर ढंग से किया है , जिसमें दस द्वार है नौ प्रगृह है तथा इसी मंदिर में उन्मुख उल्टा कुआ है जहाँ से हमेशा अमृत रूपी बूंद झरती है जो इंसान की आध्यात्मिक प्यास को बुझती है । हर मंदिर , गुरुद्वारे , गिरजाघर में दीपक जलाने प्रचलन तथा घण्टे , शंख , नाद का प्रचलन यही दर्शाता है कि हमारे निज शरीर रूपी मंदिर में भी वह रोशनी नाद अखण्ड रूप से विद्यमान है । परन्तु उसका दीदार तभी संभव होगा जब हमारा ध्यान हमारा टिकाव अपने मंदिर में होगा ।
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