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दर्शन देओ कबीर / darshan deo kabir

दर्शन देओ कबीर


साखी


1- समरथ नाम कबीर है सतगुरू नाम कबीर ।

( कबीर ) बहुत गुरू है जगत में , कोऊन लागे तीर ।।

सबे गुरू बह जायेंगे , जागृत गुरू कबीर।।

समरथ नाम कबीर है सतगुरू नाम कबीर ।।


2- काया शीप संसार में , बूंद रूप शरीर ।।

बिना शीप का मोतिया , प्रकटे साहब कबीर ।।


भजन


टेक - आबे गुरू दर्शन देवो कबीर

अब म्हारो निर्मल करजो शरीर ।।


1- जद देखू जद पेर्यो पीताम्बर

अब वाके ओढ़न अम्मर चीर ।।


2- हाथ सुमरणा गले फूलन की माला

अबे वाके कानो में झलकत हीर ।।


3- खीर खाण्डका अमृत भोजन

अबे म्हारे सबद सुन्न की खीर ।।


4- धरमदास की अर्ज गुंसाई

अबे म्हारो हंसो लगाओ पेले तीर ।।


मालवी शब्द

जद - जब

म्हारो - हमारो , मेरा ।

पेरयो - पहनना 

पेलेतीर - उस पार 


संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में धर्मदास जी गुरु के भौतिक स्वरूप का अपने अंतर की गहरी निष्ठा , आत्मीय प्रेम को श्रृंगार के रूप में शब्दों द्वारा अभिव्यक्ति करते है।


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