सतगुरु है रँगरेज
साखी-
1- सतगुरु मिला जो जानिए, ज्ञान उजाला होय।
भृम का भांडा तोड़ कर, रहे निराला होय।।
2- सतगुरु तो ऐसा मिला, जैसे लोह लुहार
कसनी दे कंचन किया, नाम लिया ततसार।।.
भजन
टेक- सतगुरु है रंगरेज चुनरिया म्हारी रंग डारी ॥
1- भाव के कुण्ड नेह के जल में , प्रेम रंग दिनी घोल ।
सत की चरसी लगाई के रे , खूब रंगी झकझोर ॥
सतगुरु है रंगरेज चुनरिया म्हारी रंग डारी ॥
2- सतगुरु ने म्हारी चुनरी रंगी रे , सतगुरु चतुर सुजान ।
सब कुछ उन पर वार दूं रे , तन मन धन और प्रान ॥
सतगुरु है रंगरेज चुनरिया म्हारी रंग डारी ॥
3- स्याही रंग छुड़ाय के रे , दियो मजीठो रंग
धोये से छूटे नाहीं , दिन दिन होत सुरंग ॥
सतगुरु है रंगरेज चुनरिया म्हारी रंग डारी ॥
4- कहैं कबीर सुणो रंगरेवा, मुझ पर होया रे दयाल ।
शीतल चुनर ओढ़ि के रे , मगन भई है निहाल ॥
सतगुरु है रंगरेज चुनरिया म्हारी रंग डारी ॥
शब्दार्थ -
चुनरि = चुनरी , लाल जमीन का कपड़ा जिस पर सफेद या दूसरे रंग की बूटियां बनी हों ; मन ।
मजीठा = मजीठा नाम की एक लता जिसको उबालने पर पक्का लाल रंग निकलता है ;
मजीठा रंग - गहरा लाल रंग ।
चसकी- चसक , मगजी के आगे लगायी जाने वाली पतली गोट ।
चास -आदत ।
भावार्थ - सद्गुरु मन रूपी चुनरी एवं चादर को ज्ञान में रंगने वाला रंगरेज है । उसने मेरी मन - चादर को अच्छी तरह से रंग दिया है । उसने मेरी मन - चादर की वासना के मैले दाग छुड़ाकर आत्मज्ञान का मजीठा - जैसा पक्का लाल रंग चढ़ा दिया । अब वह धोने से छुटने वाला नहीं है , बल्कि दिन - दिन उसका रंग खिलता जा रहा है सच्चा आत्मज्ञान किसी के प्रभाव में आकर बदलने वाला नहीं होता , प्रत्युत वह निरंतर खरा होता जाता है । सद्गुरु ने भक्ति के कुंड में अनुराग का जल डालकर उसमें आत्मज्ञान के प्रेम का रंग छोड़ दिया और मन की चादर में ध्यानाभ्यास की आदत की चसक लगाकर उसे झकझोरकर रंग दिया । सद्गुरु आत्मज्ञान तथा आत्मस्थिति में निपुण हैं ; उसमें वे बहुत समझदार हैं । मैं अपने तन , मन , धन , प्राण सब कुछ उन पर न्योछावर करता हूं ।
कबीर साहेब कहते हैं कि सद्गुरु मेरे मन की चादर को आत्मज्ञान में रंगने वाले रंगरेज हैं । उन्होंने मुझ पर कृपाकर मेरी मन - चादर ज्ञान में रंग दिया । मैं अपनी आत्मलीन मन रूपी शीतल चादर को ओढ़कर अपने आप में मस्त हूं , कृतकृत्य हूं ।
विशेष - उक्त पूरा पद रूपकों से भरा है । रंगरेज , चुनरी , स्याही रंग , मजीठा रंग , सुरंग , कुंड , जल , रंग , चसकी , चसक , चास आदि के बीच एक ही भाव का सबल उद्घाटन है आत्मज्ञान में रंगा हुआ शीतल मन ; जिसमें सद्गुरु का जबर्दस्त योगदान है । भाव , प्रेम और वैराग्य से यह काम होता है । इस आध्यात्मिक यात्रा का फल होता है मन का संसार - ताप से सर्वथा छूटकर पूर्ण शीतल हो जाना ।
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