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पिया की सुरतिया देख मगन भई / piya ki surtiya dekh magan bhai

 पिया की सुरतिया देख मगन भई 


साखी


1- पांच तत्व तीन गुण के आगे मुक्ति मुकाम ।

जहाँ कबीर सा घर किया , गौरख दत्त ना राम ।। 


2- विरहनी देय संदेशरो , सुनहु राम सुजान ।

बेगि मिलेउ तुम आइके , नहीं तो तजिहों प्राण ।। 


भजन 


टेक - मगन भई वो लाड़ली मगन भई ।

पिया की सुरतिया देख मगन भई । 


1- पाँच तत्व गुण तीनों भेला , उनका काम नहीं ।

पाँच पच्चीस सभी से न्यारा , चेतन पुरूष सहीं ।


2- नव द्वार दस तिरकुटी गगना , इनका काम नहीं ।

षट चक्कर को मेट सके री , उनसे तो पार बही ॥


3- हेली म्हारी अपरंपार पार नहीं वाका , कछु नहीं जाण कहीं ।

भागवत गीता शास्तर वाणी , वो भी तो थाक रही ।


4- राम भारती समरथ मिलग्या , सांची सैण कही ।

कल्याण भारती गुरु जी का शरणे , आगे दौड़ नहीं ।


मालवी शब्द 

मगन - खुश , आनंद । 

सुरतिया - स्वरूप । 

भेला - मिला हुआ । 

मेट - दूर करना , मिटाना । 


संक्षिप्त भावार्थ - इस पद ने संतों में पांच तत्व , तीन गुण और षट चक्र के भेदन या छेदन या इसकी भूमिका के ऊपर अपनी सुरति को टिकाने का या मन को स्थिर करने का संकेत किया है , जो प्रेम की आनंद की उच्च स्थिति है ।


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