श्री सद्गुरवे नमो नमः
कबीर के दोहे, शब्द के दोहे
1- शब्द हमारा तू शब्द का,सुनि मति जाहु सरक।
जो चाहो निज तत्व कॊ, तो शब्दहि लेहु परख।
2- शब्द हमारा आदि का,शब्दै पैठा जीव।
फूल रहन की टोकरी, घोरे खाया घीव॥
3- शब्द बिना सुरति आँधरी,कहो कहाँ कॊ जाय।
द्वार न पावै शब्द का,फ़िर फ़िर भटका खाय॥
4- शब्द-शब्द बहु अन्तरे,सार शब्द मथि लीजै।
कहहिं कबीर जहाँ सार शब्द नहिं,धृग जीवन सो जीजै॥
5- शब्दै मारा गिर परा, शब्दै छोड़ा राज़
जिन्ह-जिन्ह शब्द विवेकिया,तिनका सरिगौ काज॥
6- शब्द हमारा आदि का, पल - पल करहू याद।
अन्त फलेगी माँहली, ऊपर की सब बाद॥
7- जिन्ह - जिन्ह सम्भल ना कियो, अस पुर पाटन पाय।
झालि परे दिन आथये, सम्भल कियो न जाय॥
8- यहाँ ई सम्मल करिले, आगे विषई बाट।
स्वर्ग बिसाहन सब चले,जहाँ बनियाँ न हाट॥
9- जो जानहु जिव आपना, करहु जीव कॊ सार
जियरा ऐसा पाहुना,मिले न दूजी बार॥
10- जो जानहु जग जीवना, जो जानहु सो जीव।
पानि पचावहु आपना,तो पानी माँगि न पीव॥
11- पानि पियावत क्या फिरो, घर-घर सायर बारि।
तृषावन्त जो होयगा,पीवेगा झख मारि॥
सदगुरु कबीर साहेब
हे मनुष्य ! जो हमारे निर्णय वचन है, तुम उनके अधिकारी हो, परंतु उन्हे सुनकर खिसक न जावो, बल्कि उनका आचरण करो।
यदि तुम अपने मूल स्वरूप का बोध(आत्मज्ञान) चाहते हो, तो सार-असार की परख करो। हमारे निर्णय वचन जीव के मूल स्वरूप के परिचायक है।
परंतु जीव भ्रामक शब्दों में घुसा पड़ा है। मानव शरीर तो सारशब्द रूपी फूल रखने की टोकरी है।
परंतु जैसे घी मट्ठा में पड़ा रहने से खराब हो जाता है, वैसे ही जीव भ्रामक शब्दों में पड़ा रहने से पतित हो जाता है। निर्णय वचनों कॊ न पाने से मनुष्य का मन विवेकहीन होकर चित्तवृति अंधी हो गई है।
कहो भला, वह कहाँ जायेगा? वह शब्दों का द्वार गुरुमुख निर्णय वचन न पाने से बारम्बार कल्पित शब्दों के भँवरजाल में भटका खाता है। शब्द-शब्द में बड़ा भेद होता है।
इसलिए विवेक की कसौटी पर कस कर सारशब्दों कॊ निकाल लो।
कबीर साहेब कहते है कि जिस मनुष्य में सारशब्दों का विचार ओर आदर नहीँ है, वह व्यर्थ ही जीवन जी रहा है विष्यासक्तिपूर्ण एवं भ्रामक शब्दों ने ऐसी चोट मारी कि उसे घायल होकर कितने मनुष्य अपनी मानवता एवं कल्याणपद से पतित हो गये। परंतु कुछ विवेक-वैराग्यपूर्ण शब्द सुनकर, राज्य तक की आसक्ति त्यागकर कल्याणस्वरूप विरक्त हो जाते है। इसलिये जिन-जिन लोगों ने सत-असत शब्दों का विवेक कर सत्य का ग्रहण ओर असत्य का त्याग किया, उनका कल्याण बन गया। हमारे निर्णय-शब्द मूल चेतनस्वरूप के परिचायक है,अत: ऐसे शब्दों का निरंतर मनन-चिंतन करो।
इसके अंतिम फल में स्वरूपस्थिति रूपी महल के निवासी बन जावोगे,
ऊपर की माया तो सब व्यर्थ है। ऐसा उत्तम नर-शरीर ओर सत्संग पाकर जिन्होने आध्यात्मिक पूँजी नहीँ बना ली, वह बूढ़ा होने पर तथा जीवन के अन्त होने पर कुछ नहीँ कर सकेगा। वर्तमान स्वस्थ नरजन्म में अपनी कल्याण-साधना कर लो।
इसके अतिरिक्त पशु आदि खानियों में तो केवल विषयों का मार्ग है। सब जीव स्वर्ग में कल्याण-सौदा खरीदने चले, जहाँ न व्यापारी है, न बाजर। अर्थात न सद्गुरु है, न सत्संग। यदि जीव कॊ अपना स्वरूप समझते हो, तो जीव कॊ पूर्णतः प्रमाणित सत्ता समझो ओर उसका स्वागत करो। जीव मानव शरीर में ऐसा पाहुना है, जो लौटकर पुन: इसमे नहीँ आयेगा। अगर जगत में जीने की कला जानते हो ओर उस जीव कॊ भी जानते हो जो तुम्हारा स्वरूप है, तो आज तक की ग्रहण की हुई सारी वासनाओं कॊ नष्ट कर दो तथा आगे किसी प्रकार की वासना, संसार से ग्रहण मत करो। उपदेश क्या देते फिरते हो! सबके मन में ज्ञान का सागर भरा है, अर्थात सबको अहंकार है कि हम ज्ञानी है। जो व्यक्ति सत्योपदेश का प्यासा होगा, वह अहंभाव कॊ छोड़कर स्वयं ग्रहण करेगा। कबीर साहेब कहते है कि हमारे शब्द सारपूर्ण निर्णय वचन सारशब्द है जो स्वरूपबोध(आत्मज्ञान) कराने वाले है,तुम भी शब्दो कॊ विवेक ओर तर्क की कसौटी पर कसना सीखो,फ़िर सारशब्दों कॊ ग्रहण करो ओर असार शब्दों कॊ त्याग दो, सारशब्दों कॊ आचरण में लाने पर वासनाएँ क्षीण होकर अन्त:करण शुद्ध हो जाता है, सब ग्रंथियों की गाँठें खुल जाती है एवं सुरति(चित्तवृति) शांत होकर चित्त एकाग्र हो जाता है जिससे ध्यान-समाधि(सहज-समाधि) द्वारा स्वरूपस्थिति रूपी महल कॊ पाया जा सकता है, जो मनुष्य का सर्वोच लक्ष्य(मोक्ष) है।
सप्रेम साहिब बंदगी साहिब

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