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कबीर साखी अर्थ सहित / kabir sakhi arth sahit

कबीर साखी अर्थ सहित 


लोगों  केरि अथाइया ,

             मत कोई पैठो धाय ।

 एकै    खेत   चरत हैं ,

             बाघ   गधारा 


सद्गुरुदेव कबीर साहब कहते हैं कि हे संतजन ! हे भद्रपुरुष ! जिस स्थान पर अच्छे लोग न बैठते हों उस अथाइया और सभा गृह में मत जाओ । क्योंकि उसमें कुछ अच्छे लोग आते हैं । बहुत से कुत्सित विचार के आते हैं   । बहुत से मध्यवर्ग के आते हैं । किसी ग्राम के सभा भवन में जाने से पहले उसमें दौड़कर प्रवेश मत करो क्योंकि बिना बुलाए बिना लोगों के स्वभाव गुण जाने यदि तू जाता है तो वहाँ तेरा अपमान होगा । तुझे कोई बैठने के लिए नहीं कहेगा क्योंकि ऐसे घरों में अधिक गन्दे विचार के लोग ही बैठते हैं । जिस प्रकार से एक ही खेत में व्याघ्र,  गदहा,  गाय मिलकर चरते हों तो भला उसमें कब तक गाय और गदहा का हित होगा । क्योंकि व्याघ्र जो है गाय और गदहा दोनों को खाने वाला है । गर्दभ जो है गाय को दोलची चलाकर पीटने वाला है । कहने का तात्पर्य यह कि जिस सभागृह में व्याघ्र रूपी सबके शोषक लोग बैठे हों । जो केवल प्रजाजनों से कर को वसूलते हों । अपनी धाक जमाकर सबको भयभीत करते हों । जहाँ न्याय का नाम नहीं हो । इसी प्रकार से जिस  सभाभवन में जुत्तम-जूती वाले हों । बात-बात पर गाली-गल्लम करते हों ।   जहाँ सभ्यता का कोई नामोनिशान न हो । सभी लोग उदण्ड हों और जिस सभाकक्ष में गाय के समान बुजदिल हो और कुछ करने में समर्थ न हों । केवल बात की पूड़ी पकाने और बात से ही आकाश-पाताल एक करते हों । कर्त्तव्य से हीन कर्त्तव्य का उपदेश देते हों । इसी प्रकार से उन गुरुद्वारों में, उन आश्रमों में, उन मठों में, जहाँ पर धर्म का चोला पहनकर अधर्म का काम करते हों, सद्गुरु कहते हैं कि हे जिज्ञासु जन ! ऐसे स्थानों पर नहीं जाना चाहिये 


कबीर आप ठगाइये,

और न ठगिये कोय ।


               आप ठगे सुख होत है,

               और ठगे दुख होय ।।


सदगुरु कबीर साहेब


सदगुरु कबीर साहेब कहते है कि आप स्वयं ठगी का शिकार हो जाइये लेकिन स्वार्थ लोलुपता के वश दूसरों को मत ठगिये । स्वयं ठगी का शिकार होंगे तो सुख की उत्तपत्ति होगी लेकिन दूसरों को ठगी का शिकार बनाएंगे तो दुखदर्द ही मिलेगा ।

भाव यह है कि जैसा कर्म करेंगे उसी के अनुरूप फल की प्राप्ति होगी ।


 साहेब बन्दगी साहेब


कबीर माया मोहिनी,

भई अंधियारी लोय ।


             जो सोये सो मुसि गये,

             रहे  वस्तु  को  रोय ।।


सदगुरु कबीर साहेब 


सदगुरु कबीर साहब कहते है कि इस माया के चकाचौंध से सभी लोग अंधे हो गये हैं । जो इसके चकाचौंध से प्रभावित होकर इसे स्थायी सुख समझ कर गहन निंद्रा में लीन हो गये और जब नींद खुली,इसे छोड़कर जाने की बारी आई,केवल रोते रह गये ।

भाव यह है कि अस्थायी को स्थायी समझने का भूल ही अन्तोगत्वा दुख का कारण बनता है ।


सत साहेब बंदगी साहेब  


जग में बैरी कोई नही,

जो मन शीतल होय ।


              या आपा को डारि दे,

              दया करे सब कोय ।।


सदगुरु कबीर साहेब


यदि हम मन से शीतलता को धारण कर ले,तो हमे सर्वत्र अपना मित्र ही दिखाई देगा ।जिन्होंने अहंकार का त्याग कर दिया । ऐसे जन सभी को प्रिय होते है ।

भाव यह है कि अहंकार के त्यागने से ही सर्वत्र अपनापन नजर आता है ।


साहेब बन्दगी साहेब


निंदक नियरे राखिए, 

ऑंगन कुटी छवाय,


           बिन पानी, साबुन बिना, 

           निर्मल करे सुभाय।


अर्थ : जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है.


सत साहेब बंदगी साहेब 


 कबीर    माया   बेसवा,

 दोनूँ   की   एक   जात ।


          आवत  को  आदर  करे,

          जात    न  बुझै     बात ।।



टीका:--सद्गुरू कबीर साहेब जी कहतेे है कि धन और वेश्या---दोनो की एक जात है ।

ये प्रथम मिलने पर तो इतना सुन्दर भाव से आदर करते हैं कि, जाते समय बात तक नहीं पूछते और  "निर्दय"  होकर चले जाते हैं तब धीरे-धीरे सब कुछ बर्बाद हो जाता है ।


तिलक माला तो भेष है,

भाव भक्ति है और ।


           जिन पांचो को बस किये,

           सो साधु सिरमौर ।।


सदगुरु कबीर साहेब


तिलक माला पहन कर साधु के रूप में परिलक्षित होना केवल भेष है । उसका भक्ति भाव से कोई सरोकार नही है । भक्ति भाव के लिये भेष की नही पांचो इंद्रियों को नियन्त्रित करने की आवश्यकता है । जिन्होंने इस साधुता को ग्रहण कर लिया । सही मायने वही साधुओं में भी श्रेष्ठ है ।

भाव यह है कि साधु की पहचान भेष से नही उसकी साधुता से होती है ।


साहेब बन्दगी साहेब


जो तु मुझको चाहे 

मत राखै कुछ आश ।।


                                    मुझ सरीखा होय रहे                                        

सब कुछ तेरे पास ।।



यह बात उन्हौने होने वाले सन्तो ,अपने होने वाले साधूओ और अपने होने वाले साधको सबसे कही है इस बात से उनका कोई भी भक्त अछुता नही है फिर तुम बार-बार उनके पीछे हाथ धोकर क्यौ पड़े हो ? क्यौकि ये सब खोटे सिक्को की पहचान है क्यौकि तुम अपने आपको कसौटी पर कसने से डरते हो और अपनी बला को कबीर साहेब के उपर डाल देते हो राम कसौटी पर तो खरा वही उतरता है जो अपने को चड़ाने को तैयार हो जाता है लेकीन तुम अपने को चड़ाने को तैयार नही हो तुम अपने बदले मे केला नारियल बर्फी पान सुपारी चड़ा आते हो तो मुक्ति भी केला नारियल को ही मिलेगी तुम्है नही ।


सप्रेम साहेब बंदगी 

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