टेक- दीनबन्धु दीनानाथ मेरी
तस तस हरिये । टेर ॥
1- सोने का सनेही नहीं
रुपे को रुपया नहीं ।
कौड़ी रुपया हाथ नहीं
जासों कुछ लीजिये ।
दीनबन्धु दीनानाथ
मेरी तस तस हरिये ।
2- भाई नहीं बन्ध नहीं
कटुम्ब परिवार नहीं ।
ऐसा कोई मन्तर नहीं
जासों मंतर कीजिये ॥ २ ॥
दीनबन्धु दीनानाथ
मेरी तस तस हरिये ।
3- खेती नहीं , पाती नहीं
बनिज व्यौपारा नहीं
ऐसा कोई शाह नहीं
जासु कछु लीजिये ॥ ३॥
दीनबन्धु दीनानाथ
मेरी तस तस हरिये ।
4- कहत है मलूक दास
छोड़ दे बिरानी आस ।
ऐसा सतगुरु पाईके
शरण किसकी लीजिये ॥ ४ ॥
दीनबन्धु दीनानाथ
मेरी तस तस हरिये ।
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