साखी - राम रहीमा एक है , मत समझो कोई दोय ।
अन्तर टाटी भरम की , यासे सूझे दोय ॥1 ॥
' देखहूँ जग बोराना '
भजन
टेक - साधु देख हूँ जग बोराना
सांच कहुँ तो मारन धावे झूठा जग पतियाना रे साधु
देखहुँ जग बोराना ॥
1. हिन्दु कहता राम हमारा , मुसलमान रहमाना
आपस में दोऊलड़ - लड़मरता , मरम काहून नहि जाना॥
2. बहुतक देखा नेमी धरमी , प्रात : करे असनाना
आतम छोड़ पाषाण ही पूजे , उनका थोथा है ज्ञाना ॥
3. आसन मार डिम्ब घर बैठे , मन में बहुत गुमाना
पीतर पाथर पूजन लागे , तीरथ बने है भुलाना ।।
4. माला पहरे टोपी पहरे , छाप तिलक अनुमाना
साखी शबदे गावत भूले , आतम खबर न जाना ॥
5. घर - घर मंतर देत फिरत है , महिमा के अभिमाना
गुरूवा सहित सब शिष्य ही डूबे , अन्तकाल पछताना ॥
6. बहुतक देखे पीर ओलिया , पढ़े किताब कुराना
करे मुरीद कवर बतलावे , उनहुँ खुदा न जाना ॥
7. कहत कबीर सुनो भाई साधो ई सब भरम ' भुलाना ।
कहाँ लग कहूँ कह्यो नहीं माने , आपही आप समाना ॥
मालवी शब्द
1.भरम - ना समझो , धोखा
2- सुझे - दिखना है ।
संक्षिप्त भावार्थ - सद्गुरु कबीर जाति धरम व मजहबी , पाखण्डवाद के धोखे से बचने के लिए चेतना देते हैं और सत्य साँचजो देखासोकहकर मानवमें आपसी प्रेमभावको स्थापित करते हैं व बाह्य आइम्बार से मुक्तकर निजस्वरूप आत्मबोधकी ओर प्रेरित करते है ||

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