भजन
कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो ॥ टेक ॥
चंदन काठ के बनल खटोलना , ता पर दुलहिन सूतल हो ॥१॥
उठो री सखी मोरि माँग सँवारो , दुलहा मोसे रूठल हो ॥२॥
आये यमराज पलँग चढ़ि बैठे , नैनन आँसू छूटल हो ॥३ ॥
चारि जने मिलि खाट उठाइन , चहुँ दिस धूं धूं उठल हो ॥४॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो , जग से नाता छूटल हो ॥५॥
शब्दार्थ - ठगवा = अशुद्ध मन , मौत । दुलहिन विवेकबुद्धि । दुलहा- चेतन पुरुष
भावार्थ - किसी ठग ने नगर को लूटकर उसे उजाड़ कर दिया है । अशुद्ध एवं अविद्याग्रसित मन ने मनुष्य के हृदय - नगर को लूटकर उसे वीरान कर दिया है । इसीलिए मनुष्य का हृदय सदैव संताप एवं अतृप्ति के अनुभव से भरा रहता है ।
कल्याण साधना करने योग्य यह मानव - शरीर मानो चंदन - काष्ठ से बना उत्तम खटोला है , जिस पर विवेकबुद्धि रूपी दुलहन तो विराजमान है , परंतु सोई हुई है । अर्थात मानव शरीर में विवेकशक्ति स्वाभाविक है , परंतु वह सुप्तावस्था में पड़ी है ।
सत्संग के प्रभाव से कुछ - कुछ जागी हुई मनोवृत्ति विवेकबुद्धि से कहती है कि सखी ! उठो और मेरी मांग संवार दो , मुझे सुसंस्कारित कर दो । मेरी अभद्रता से मेरे पतिदेव चेतन पुरुष मुझसे रूठे हुए हैं । मनोवृत्ति की मलिनता से ही तो जीव दुखी रहता है ।
जो अपना कल्याण नहीं कर पाता है , वह अंतत : धोखा खाता है और एक दिन अचानक मौत आकर मनुष्य के ऊपर उसी प्रकार चढ़ बैठती है और उसे १ दबोचती है जैसे बिल्ली चूहे को । फिर तो नेत्रों से आंसू बहाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता ।
कबीर साहेब कहते है कि हे भाई संतो ! सुनो, उसने अपनी जिस बनाई हुई दुनिया से बड़ा पक्का रिस्ता जोड़ रखा था, वह सदा के लिए छूट जाता है। माने गये परम परिचित प्राणी - पदार्थ सदैव के लिए विस्मृति के गर्त में डूब जाते है।
साहेब बंदगी
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