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सुरता को करणो है ब्याह/surta ko karno he byah bhajan lyrics

सुरता को करणो है ब्याह/surta ko karno he byah bhajan lyrics


 


                       साखी

1-घट में औघट पाईया , औघट माहि घाट । 

कहे कबीर परिचय भया गुरु दिखाई बाट । 


2-सतिया का सुख देखना जले पिवके संग । 

   आगे आग लगात है तऊना मोड़े अंग ॥ 


3-पतिव्रता पीहर बसे नित उठ पति को ध्यान

      कहे सुणे लाजे मरे ऐसो आतम ज्ञान ॥


                              भजन


            हेली म्हारी ! सुरता को करणो है ब्याह

सुरता को करणो है ब्याह जोड़ी का बनड़ा ना मिल्या । हो जी ॥


           हेली हारी ! मिल्या मिल्या लोग हज़ार

मिल्या मिल्या लोग हज़ार उन से तो दिलड़ो ना मिल्यो । हो जी ॥


          हेली म्हारी ! विपत बिरामन बुलावजो

विपत बिरामण बुलावजो लगना जचाओ रे , हो जी ॥ 


         हेली म्हारी ! छोड़ी दूंआ मामा मोसाल

छोड़ी दूंआ मामा मोसाल पिया की लारां होई जाऊं , हो जी ।। 


         हेली म्हारी ! चढ़ी जाऊं या औघट घाट

चढ़ी जाऊं या औघट घाट काया गढ़ के छेकी जाऊं । हो जी ॥


         हेली म्हारी ! वां खुला है दसमां द्वार

वां खुला है दसमां द्वार साहिब जी से जई मिलूं वा ।। हो जी ॥


        हेली म्हारी ! सुरता को कर दीन्हो ब्याह

सुरता को कर दीन्हो ब्याह जोड़ी का बनड़ा वां मिल्या ॥ हो जी ॥


        हेली म्हारी ! कहे कबीर धरमदास से

कहे कबीर धरमदास रटो निज नाम के ॥ हो जी ॥


संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में कबीर साहब ने आत्मा को अपना परमात्मा रूपी या सुरति को शब्द रूप दूल्हा ढूंढ़ने या मिलने की बात करते है जहां सुमति सुरति , जीवात्मा रूपी दुल्हिन जिनकी अनेक कुमति रूपी आशा , तृष्णा , माया , ममता रूपी परिवार भी है । अतः इन सबको छोड़कर अपने प्रियतम या पिया जिव शब्द जो इस काया रूपी महल में दशवे द्वार में आत्मा-परमात्मा का या सुरति से शब्द से नाद या प्रकाश , ज्योति के रूप में होगा।  यह बना बनी का मिलने का संकेत करते है।


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