योग सिद्धांत क्या है ? yog sidhdant kya he ?
प्रश्न भजन
टेक - मुझे गुरुदेव कर किरपा योग सिद्धान्त बतलावो ।
कहो यम काहेको कहते , नियमका रूप क्या स्वामी ।
आसन विधि खोल दो मुझसे , प्राणायाम दर्शावो ॥१ ॥
प्रत्याहार सो क्या है , कहो सब ध्यान समझाकर ।
धारणा किस को कहते हैं , समाधी साधन समझावो ॥२ ॥
योग को शब्द को स्वामी , सुना है हमने कानों से ।
अर्थ नाही समझ आता , मुझे गुरुदेव आर्थावो ॥३ ॥
भारती कल्याण गुरु पाया , पूर्व निज पुण्य के बल से ।
यों सेवा भारती गावे , प्रकट दीदार करवावो ॥४ ॥
उत्तर भजन
टेक - सुनो सिख ध्यान समाधी लगावो ।
चित चञ्चल एकाग्रह लावो जीवन मुक्ति फल पावो ।
बांई ऐडी सिवन मध्य रख मूल के बन्द लगावो ।
दायां पांव लिग मध्य राखो इनविध जोग जगावो ।।१ ॥
वायु गुदा से खेंचो ऊपर स्वाधिष्टान पर लावो ।
फिर मणिपूरक ऊपरआ के कुण्डलनी शक्ति जगावो ।
जालन्धर बन्द से द्वार सब रोको उल्टी पवन चढ़ावो ॥३ ॥
अनाहत चक्र श्वेतद्वादश दल वहाँ से नाद सजावो ।
मन को लीन करो अनहद में उर आनन्द बढ़ावो ॥४ ॥
कण्ठ कमल में लग टकटकी बिन रसना गुरण गावो ।
अर्ध उर्ध बिच बंक बाट है वहां होके सुरंग लगावो ॥५ ॥
तालु विवरऽस्थान छेद के रसना उलट चढ़ावो ।
बन्द उडियान खेचरी मुद्रा केवल कुम्भक पावो ।।६ ।।
त्रिकुटी अन्दर झिलमिल झिलके मनभर दर्शन पावो ।
गगना गरजे दामन दमके ताही में सुरत पठावो ॥७ ॥
कमल सहस्त्रदल शीश मध्यमें अमिफुवार बरसावो ।
इड़ा पींगला सुखमण संगम त्रिवेणी चढ़ नहावो ।।८ ।।
श्रुति कमल है हंस मुखी वहां अजपा चुप्प करावो ।
श्वेत धार पर धर्मराय यम किस विध आगे जावो ।।६ ।।
आगे दशवां द्वार शून्य है ताहि खोल कर आवो ।
आतम पद है स्थान फुकरका निरभय नगर बसावो ॥१० ॥
महा शून्य मैदान विघन अति देख मती चकरावो ।
ओहम अलख अर्थात् निरंजन भँवर गुफा ध्वनि छावो ।।११ ।।
सत्य लोक जहां सत्य पुरुष है तामें जाय समावो ।
सेवा भारती को कहे शिवब्राह्मी सहज मुक्त हो जावो ।।१२ ।।
अर्थ -- चितकी एकाग्रताका ही नाम समाधि है और कोई तात्पर्य नहीं । योग नाम जुड़ने का है , जैसे विषय भोग से चित को हटाके श्रुति जो चित की वृति है ताको अपनी आत्मा के स्वरूप में जोड़े अर्थात् लगावे फिर आसन पे स्थित होके शनैः शनैः साधन करे अथवा स्वांस और प्रस्वांस की गति को निरोधे। इसी को पातंजलि मुनि ने योग सूत्र में प्राणायाम कहा हे ।
सो सूत्र यह है कि - तस्मिन सति स्वांस प्रस्वांसयोगात
विच्छेदः लक्षणः प्राणायामः इति : अर्थ -- आसन पर स्थित होके जो वायु बाहर से नासिका के भीतर जावे उस को स्वांस कहते है और भीतर से बाहर आवे वह प्रस्वांस है , इन दोनों को निरोधना ही प्राणायाम है । सो प्राणायाम चार प्रकारका है अन्तर वृति , बाहरवृति , रयम् वृति , तुरियावृति ,। अन्तरवृति पूरक अर्थात् वायु को भरना , बाहरवृति रेचक अर्थात् वायुको निकालना , रथमवृति कुम्भक अर्थात् वायु को ठहराना और रथम वृतिकी विशेष अवस्थाको ही तुरिया वृति कहते हैं । जीव ब्रह्म की एकता इसीको जानो और सिद्धांत में तत् त्वम् पदके लक्ष्यार्थको ही तुरिया अवस्था कहते हैं , यह नियम है ।
इस शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोम हैं और ग्रंथों में उतनी ही नाड़ियां वर्णन की है । उनमें बहत्तर हजार मुख्य हैं सो शिवजी ही जाने हैं अन्य नहीं । उन बहतर हजार में से चौवीस योगी जनों के वास्ते वर्णन की है । जिनमें से दो २ नाड़ी तिरछी गई हैं तिनको ध्वनि नाड़ी कहते हैं । अब शेष रही बीस जिनमें दस नाड़ियां तो नाड़ी रूप से है और दश प्राण रूप से है ।
अब हम नाड़ी रूप दश नाड़ियों का वर्णन करते हैं । १ - शंखनी जिसका स्थान गुदा है , २-कृकला जिसका स्थान लिंग है , ३-अस्वनी स्थान बायां कान , ४-पुष्पा का स्थान दायां कान है , ५-गंधारी का स्थान बायां नेत्र है , ६-हस्तिना का स्थान दायां नेत्रहै , ७-लम्बुका मुख अर्थात् जिह्वा , ८-इड़ा वाम स्वर है , जिसको चन्द्र स्वर भी कहते हैं , ९-पिंगला दक्षिण स्वर है , जिसको सूर्य स्वर भी कहते हैं और १०- सुखमना इनके बीच में है जिसको अत्यन्ता नाड़ी भी वोलते हैं । वह ब्रह्मरंधूतक पहुँच गई है , सो बिना गुरुके नहीं जानी जाती ।
जैसे कि कपिल मीता में कहा है : श्लोक - तस्याः सिखायाः मध्ये …च परमात्मा व्यवस्थितः
गुरु मुखेन ज्ञातव्यं अन्यथा लोप लभ्यतेः ।
अर्थ - कि परमात्मा सिखा याने सुखमना नाड़ी के मध्ये में स्थिर हैं सो बिना गुरु नहीं जानी जाती ।
श्री नानक जी ने भी कहा है दोहा - नानक धरण गगन के अन्तर चन्द्र सूर्य का मेल ।
कोई योगी गुरु मुख लखे अकल कला का खेल ।
यह दश नाड़ी तो नाड़ीरूपसे है और शेष दश प्राणरूप , से है , उनके भी दो भेद - पांच प्राण और पांच उप प्राण हैं । सो पांच प्राण ये हैं , प्राण जिसका हृदय स्थान है और क्षुधा पिपासा ताकी क्रिया है । अपान का गुदा स्थान है जो कि मल मूत्र त्यागने रूपी क्रिया को करै है । समान का नाभी स्थान है , वह अन्न जल को पचा के समान करें है । उदान जिसका कण्ठ स्थान है वह स्वांस क्रिया को करै है और व्यान जो सर्वत्र शरीर में व्यापक है । ये पांच प्राण हैं ।
उप प्राण ये हैं कृकला जिस को छींक बोलते हैं सो दिल के बीच में रहता है । देवदत्त जिसको जम्भाई बोलते हैं सो छाती में रहता है , नाग जिसको डकार बोलते हैं वह कंठमें रहता है । कूर्म जिससे पलकें झपकती हैं नेत्रों में रहता है और धनंजय अंडकोष व जोड़ों की संधियो में रहता है . देहको उठाना चलाना इसीका कर्म है । परन्तु सिद्धांत में इस का ग्रहण नहीं किया है कारण कि स्थान भेद से प्राण दश प्रकार का है , अन्यथा तो वह एक ही है
जैसे अतिमें कहा है , '
अर्थ - वह एकही प्राणवायु रूप को प्राप्त होता भया और भीतर से बाहर जाता है , वह प्राण द्वादश अंगुल पर्यन्त जाकर लौटे हैं तब अपान स्वरूप से भीतर प्रवेश करे है । प्राण की ऊपर गति है और अपान की नीचे । पूरक करते समय प्राण अपान को मिलाकर स्वांसको ऊपर खींचना ही प्राणायाम हैं ।
सारांश यह है कि -- प्राण जब उठकर अपान से मिले है तब अपने स्वरूपका अनुभव होवे है और अपान जब उठके प्राण से मिले है तब पुरुष प्रानन्द को प्राप्त होते है ।
यहीं पर सहस्त्र दल कमल है । इससे भी और जागे चलकर श्रुति कमल चार पंखड़ी का है । जिसको सन्त हंस मुखी और त्रिकुटी कहते हैं , तहाँ 'र' कार ' म' कार अर्थात् प्रणव है । उससे अगाडी श्वेत वरण नाम जल की धारा है जहां अजपा चुप होवे है । उससे आगे धर्मराय का स्थान है , तहाँ धर्मराय मना करे है कि दशवां द्वार बन्द है आगे कोई मत जावो । धर्मराय के राज से आगे दशवां द्वार शून्य है , एक पंखड़ी का कमल है , आत्मपद है , फुकरों का मुकाम है जिसको आहुत भी कहते है , और साकेत लोक भी ।
यह अद्भुत मुकाम है तथा यहाँ कोटि भानुका प्रकाश है । जहां न धूप है न छाया है , यहां पांचों शरीरो को त्याग के केवल हंस रूपसे साकेत लोक प्राप्त होवे है । तात्पर्य यह है कि मूलाधार में ब्रह्म ज्योति है जिसको मकर तार कहते हैं सो सुखमना नाड़ी में लगा हुआ है , सो साकेत अर्थात् दसवां द्वार से सून्य लोक पर्यन्त गया है यहां कुण्डली सीधी करने का कोई प्रयोजन नहीं इसी सुखमना नाड़ी द्वारा 'र' कार 'म' कार से दशवा द्वार जो बन्द है ताको खोलकर सत लोकमें पहुंचा जाय । दूसरा मार्ग यह है कि प्राणायाम से कुण्डली सीधी करके बंकनाल द्वारा प्राण को चढ़ा के मेरुदण्ड की इक्कीस मणिका घटना ही षट्चक्कर का छेदना कहा है फिर यहांसे तालु विब्र अर्थात छिद्र को छेदन करके सहस्त्र दल व श्रुति कमल में जाकर उससे वित धारसे पार हो दशवां द्वारको खोलकर सत लोक में प्राप्त हो जाय।
। अब यहां यह विचार करना योग्य है कि बहुत से संत महात्माओ का यह दशवा द्वार ही परमपद है और कोई कोई महात्मा इससे आगे भी तीन मुकाम और कहते हैं ,
१ महासून्य जिस जगह मैदान और अंधकार है जिसको महाकाल और महामाया भी बोलते हैं ।
इससे अगाड़ी ,
२ भंवर गुफा अर्थात् सतलोक की ड्योढी जिस जगह अलक्ष पुरुष अर्थात् सोहं पुरुष जिसको निरंजन भी कहते हैं । इससे आगे ,
३ सत लोक जिसको सत पुरुष व सतनाम और सत शब्द भी कहते है। वाणी जो चार प्रकार की होकर उठे है ,
सारांश यह हैं । अग्नि और वायु का सम्बन्ध होनेसे नाद प्रकट होती है जिसको अनाहत शब्द कहते हैं , इसका प्रतिपादन आगे होगा ।
योग के आठ भेद हैं , सो ये है --- यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , ध्यान , धारणा और समाधि।
षटकर्म ये है - नेति , धोति , बस्ती , नवली , गज और त्राटक ।
नेति -- यह है कि " बारीक सूतका मोटा डोरा बटकर सवाबालिस्त लेवे तथा उसपर मोम लगाके नासिका रंध में प्रवेश करके मुख द्वारसे बाहिर निकाल ले , इसी को नेति कहते हैं ।
धोति - कई प्रकार की है श्रवन होति , दन्त धोति , तालू धोती हिरदै धोति तीन प्रकार की है , डंड , पवन और वस्त्र तथा अन्तर धोति चार प्रकार की है , बात सारके काग के समान मुख करके पेटभर पानी पीना और फिर निकाल देना , वारिसारके कंठ तक जल पीना तथा फिर निकाल देना , अग्निसारके नाभी को लफाके मेरु डण्ड के लगाना , बहिष्कृतके काग के समान मुख करके पेटभर पानी पीना और फिर गुदा की राह ही निकाल देना ।
बस्ती - नाभी डूबजावे उतने जल में उत्कट आसन पै बैठे गुदा में भोगलीदेसंकोचविकास करके जलको ऊपरचढ़ावे इसको बस्ती कहते है।
नौली - और दोनों बगलोंको घुमाके पेटको लफावे यह नौली है ।
गज -पेट भर पानो पीवे गुदा हो निकाल देवे तथा गुदा ही पीवे मुख हो निकाल देवे इसको गज कर्म कहते हैं ।
त्राटक-नासिका के अग्र भाग पर दृष्टिको लगावे यह त्राटक है ।
कमल भांति तीन प्रकार की है , वात कर्मसे इड़ा नाड़ी के द्वारा वायु को भरना फिर पिगला नाड़ी होकर निकाल देना , पित्त कर्म के नासिका ही पानी पीना तथा मुख हो निकाल देना और सीत कर्म के मुख ही पानी पीना तथा नासिका हो निकाल देना ये षट कर्म हैं ।
अब सिद्धि दायक आसनों को वर्णन करते हैं कि जिनको साधने से योगीजन तत्ववेत्ता हो जाते हैं ।
आसन -- योगशास्त्र में आसन चौरासीलक्ष कहे हैं सो जीव मात्रकी बैठक के समान हैं , सो जान लेना चाहिये । उसमें चौरासी मुख्य है सो भी शिवजी ने अपने स्वाधीन रखे हैं ।
तात्पर्य यह है कि और सभी आसन तो रोग निवृति करने वाले हैं , योग सिद्धांत में तो दोही पादन किये हैं । सो सिद्ध और पद्म कहाते हैं । उनमें प्रथम सिद्ध आसनकी विधि कहतेहैं कि -
गुदा और लिंगके बिच में जो योनि कुण्डली का स्थान है , उसको बाम पादको एडीसे दृढ़ता से दबाकर तथा दाहिने पैरकी एड़ी लिंग पर रखकर दबावे , तब दोनों पैरकी एड़ियां नीचे ऊपर हो जाती हैं तथा दोनों पैरों के अंगुष्ट ,
अब पद्म आसन विधि सुनो , दाहिना पांव बाम जंगा पर तथा बाम पैर दाहिनी जंघा पर रख करके दाहिने हाथ को पीठ पीछे घुमाके दाहिने पांव के अंगूठे को पकड़े तथा बाम हाथको घुमा कर के बायें पांवका अंगूठा पकड़े । अब चिबुक ( ठोड़ी ) को छातीसे लगाके दोनों नेत्रोसे नासाग्र भागको देखता रहे । यही योगियोंके समस्त रोगोंको निवारण करनेवाला पद्म -- आसन कहलाता है ।
इस प्रकार पद्मासन पर स्थित होके गुदासे प्राण उठ कर क्रम से गुदा , लिंग , नाभी , हृदय , कण्ठ , और त्रिकुटी छहों चक्करों को छेदन करता हुआ तथा सहस्त्रदल में टक्कर खाता हुआ द्वादश अंगुल पर्यन्त बाहर जाके , अपान रूप होकर भीतर प्रवेश होवे हैं । अपान स कार रूप है प्राण ह कार रूप है , ह का अर्थ सूर्य स का अर्थ चंद्र तथा इन दोनोंकी एकताका नाम योग है ।
इडा पिंगला सुखमणा ये प्राण की गति है । पूरक , कुम्भक और रेचक ये प्राणकी क्रियायें हैं । जीव , ईश्वर और ब्रह्म , यह प्राणका अभ्यास है । तत् , त्वं और असि यह प्राण का चिन्तन है । इन मैं तत्पद पिंगलासो ईश्वर है , त्वं पद इड़ा सो जीव है और असि पद सुखमणा सो ब्रह्म हैं । योग सिद्धांत में सुखमणा को ही जीव ब्रह्म की एकता मानी है ।
तात्पर्य इसका यह है कि पूरक के समय प्राण अपान को सम करना ही प्राणायाम है , सो प्राणायाम तीन प्रकारका है। करने की विधी यह है कि -१६ मात्रा से इड़ा नाड़ी द्वारा पूरक करे अर्थात् स्वांस को खेंचे , ६४ मात्रासे कुम्भव करे अर्थात् स्वांस को रोके और ३२ मात्रा से पिंगला नाड़ी द्वारा रेचक करे अर्थात् शनैः शनैः वायुको बाहिर निकाल दे ।
यहां प्रणव के उच्चारण करने में जितना समय लगता है उस समय को मात्रा कहते हैं । मात्रा सहित पूरक , कुम्भक और रेचक का अभ्यास करना ही प्राणायाम है । इस क्रिया को बार २ उलट पलट करता रहे । हाथके दोनों अंगूठोंसे श्रवणों को और कनिष्टकाव तर्जनी से होठोंको , मध्यमासे नाकके छिद्रों तथा अनामिकासे नेत्रों को बंद करना ही जालंधर बन्द कहलाता है और चिबुक ( ठोड़ी } को हृदयसे लगाकर , मेरुदण्ड सीधा करके अपने प्राण वायुको ब्रह्मरंध्र में चढ़ाकर जीभकी ताली देवे , इसीको उड्डियन बन्द कहते है । खेचरी मुद्रा भी इसीका नाम है।
अब षट - चक्रोंका विवेचन सुनो , मूलाधारम् चतुर्दलम् , मूल कमल चार पांखड़ीका है , रक्त वर्ण है , शुद्ध बुद्ध शक्ति है यहां अद्भुत महिमासे गणेशजी विराजमान हैं । वं सं षं शं चार बीजोंसे सुशोभित हैं । ब्रह्म ज्योति है , जिसको परा गायत्री और मकरतार भी कहते हैं । यहां से छै सो स्वांस गणेश के निकलते हैं इतने ही जप समझ लेना । स्वाधिष्टानम् षटदलम् इन्द्रिय कमल छै पंखड़ीका है । पीत वर्ण हे , सावत्री शक्ति यहां पर ब्रह्मा विराजमान है । वं भं मं यं रं लं , छः बीजो सुशोभित है । यहां हवाके साढ़े तीन पेच ( लपेटे ) दिये जाते है और अजपा भी यहीसे प्रकट होती है ।
यहां छः हजार स्वांस ब्रह्माजी के ब्रह्माजीके निकलते है । नाभि पद्मो दशदलम् । नाभि कमल दश पांखड़ी का है , नील वर्ण है , लक्ष्मीजी शक्ति है ,
द्वादश दलम् हृदयम् । हृदय कमल १२ पांखडी का है । श्वेतवर्ण है , पार्वती शक्ति है शिवजी विराजमान है । कं खं गं घं डं चं छं जं झं टं ठं , बारह बीजोंसे सुशोभित है । अनाहत नाद यहां से ही प्रगट होता है । इस बारह पंखड़ीके कमल में आठ पंखड़ी का कमल और है जिसको ' अष्टमणि ' आठों दिश भी कहते हैं इस पै मन रूपी भँवरा फिरता रहता है । जब यह पूर्व दिशाके पंख पै जाता है तब पुण्य करने की इच्छा होती है , अग्नि दिशा पंख पर जाता है तब नींद जम्भाई और आलस होते हैं , जब दक्षिण दिशाके पंख पर जाता है तो क्रोध और कठोरता आती है।नैऋत्य दिशाके पंख पर जाता है तो पाप करने की ईच्छा होती है , पच्छिम दिशाके पंख पर जाता है तो आनंद को प्राप्त होता है , वायू दिशा के पंख पर जाता हैतो घबराहट होती है , उत्तर दिशा के पर जाता है तो मैथुन करने की इच्छा होती है और ईशान दिशाके पंख पर जाता है तो दान करने की इच्छा होती है ।
हिरदै कमलके बीच जाता हैतो वैराग्य होता है और हृदय में हिरदै पुरियेती नाड़ी जिसको आंत भी कहते हैं , उसके भीतर चित्तको स्थिति होने को सुसोपति कहते हैं । उसके आनंद भोक्ता का नाम प्राग आत्माका तीसरा पद है । और कंठ मे हिता नाम की नाड़ी है उसमें चित्तकी स्थिति होनेको स्वप्नावस्था कहते हैं . उसके आनंद भोक्ता का नाम तेजस्य आत्माका दूसरा पाद है । गंधारी अस्थिनामें चित्त की स्थिति होने को जागृत अवस्था कहते हैं । उसके आनंद भोक्ताका नाम विश्व जीव आत्माका प्रथम पादहै । चौथा पादसाक्षी दृष्टाहै , जिसको तुरीय पदयानी तुरिया अवस्था कहते हैं ।
मन जब अनहदमें लीन हो जाता है तब परमानंद स्वरूपको प्राप्त होताहै । यहांसे छः हजार स्वांस शिवजी के निकलते हैं । कंठे स्यात् षोडष दलम् । कंठ स्थानपर सोलह पंखड़ी का फूल है . प्राण शक्ति है , जीव देवता है अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋं ल्रं ल्रं एं ऐं ओं औं अं अः , १६ बीजों से शोभित है । यहां टक - टक शब्द होता है , जो बिन रसनाका शब्द है । अर्द्ध ऊर्द्ध अर्थात् इडा पिंगलाके बीच बंकनाल होके प्राणका संचार होवे हैं । यहांसे एक हजार स्वांस जीव के निकलते हैं । भू ( भोंह ) मध्ये द्वि दलम् । त्रिकुटी स्थान पर दो पंखड़ीका फूल हैं । अग्नि वर्ण है ज्योती देवता है हं ज्ञं दो बीजोंसे शोभित है । क्षं त्रं यानी मन बुद्धि मिलके बावन होते हैं । यहां गर्जना होती है , बिजलो चमकती है , सारांश यह है कि हिरदैके भीतर हिरदाकाशप्रर्थात् दण्ड धराकासहै । वहाँवायुका संचार होनेसे नाद प्रकट होता है । जिसको अनाहत शब्द और आवाजे गैब भी कहते हैं ।
ये शब्द दस प्रकार के होते हैं ,
सहस्त्र दलम् शीश मध्यम् अक्षय पुरुष निरंजनम् ।
ज्योति रूपम अमी धारम् सर्व वर्ण मोक्षकम् ।।
सहस्र दल हजार पंखडीका फूल है , सर्व वर्ण है मोक्ष शक्ति है , अक्षय पुरुष है , जिसको निरंजन भी कहते हैं , झिल मिली ज्योति है यहां इड़ा पिंगला सुखमना तीन धार होकर बही है जिसको संत त्रिवेणी भी कहतेहैं । श्रुति कमल पर्यन्त रातदिन में २१६०० स्वांस पूरे होते हैं । सहस्त्र दलसे आगे श्रुतिकमल चार पंखड़ी का है जिसको हंसमुखी त्रिकुटी कहते हैं । तहां र कार म कार अर्थात् प्रणव है । आगे श्वेतवर्ण नाम जलकी धारा है जहां अजपा जाप होवे है । जहां धर्मरायका स्थान है । अगाड़ी दसवां द्वार सून्य है । भंवर गुफा है , सत लोक है । जिस जगह सत पुरुष है . उसे सतनाम कहो चाहे सतशब्द कहो किंचित् भी भेद नहीं ,
मुसलिम दरवेशोंका कथन है कि गुदा लिंग नाभी इनको नासूद कहते हैं , हिरदै को मलकूत कहते हैं , कण्ठको जब रूप कहते हैं , त्रिकुटीको लाहूत कहते हैं , सहस्त्र दलको आहूत कहते हैं श्रुति कमलको बाहूत कहते हैं , श्वेत धाराको साहूत कहते हैं , धर्मराय के स्थानको राहूत कहते हैं औरदशवें द्वार को जाहूत कहते हैं जहां खुदा खाविंद विराजमान है ।
ब्रह्मका जो प्रकाश है , उसीको ला मकान कहा है । इस प्रकार जो पुरुषार्थ करते हैं , आवागमन को जीत लेते हैं । परन्तु यों कहने से परमात्मा एक देशीय होवे है और वेदमें परमात्मा को सर्वदेशी प्रतिपादन किया है किन्तु इसका हेतु यह है कि यह क्रिया उपासकों के परम उपासना निमित्त वर्णनकीगईहै । जिनका अन्तःकरण परमशुद्ध हैउनको इससे कोई प्रयोजन नहीं है । जैसे शब्द में कहा गया है । अब इस विषय में सर्व देशीय परमात्माकी उपासना करने वालों के लिए ज्ञान योग के ये पन्द्रह अंग कहे हैं :
यमो हि नियमस्त्यागो मौनं देशश्च कालतः ।
आसनं मूलबन्धश्च देहासाम्यं च दृकस्तिथिः ।।१ ।।
प्राणसंयमनं धैव प्रत्याहारश्चैव धारणा ।
आत्मध्यानं समाधिश्च प्रोक्तान्यंगानि बैक्रमात् ।।२ ।।
अर्थ -- यम , नियम , त्याग , मौन , देश , काल , आसन , मूलबन्ध , देह साम्य , दृक स्थिति , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , आत्मध्यान औरसमाधि ये क्रमसे पन्द्रह अंग कहें हैं सो इस प्रकार हैं :
( १ ) सबकुछ ब्रह्महीहै इस प्रकार के ज्ञानसे इन्द्रियोंके संयमको यम कहते हैं इसका बारम्बार अभ्यास करना चाहिए।
[ २ ] सजातीय वृत्तिका प्रवाह और विजातीय वृत्तिका तिरस्कार इस परमानन्द स्वरूपको विद्वान नियम कहते हैं ।
[ ३ ] त्याग महान् पुरुषों का पूज्य है और शोधू ही मोक्षका देने वाला है।
[ ४ ] जिस मौन कोन प्राप्त होकर मनसहित वाणी लौट आती है और जो योगियों को ही प्राप्त होता है । इसको विद्वान सर्वदा भजे । जिससे वाणी लौट आती है , इसको कौन कह सकता है । यही प्रपंच करने योग्य है तो वह भी शब्द रहित है । इस प्रकार सर्व - सहज नामक मौन होना ही मौन कहा है वाणी का मौन तो बालकों का है , ब्रह्म वादियों के करने योग्य नहीं है ।
[ ५ ] आदि मध्य और अन्त में जिसमें जन नहीं है । परन्तु वह जिस में व्याप्त है , वह देश निर्जन माना गया है ।
[ ६ ] ब्रह्मा अादि सर्वभूतोंकी निमिसकी गणनाकी जो कल्पना होती है वह अखण्ड अद्वय ' काल ' शब्दसे कहा गया है ।
[ ७ ] जिसमें सूरत में ही सतत तत्वरूप ब्रह्मका चिन्तन हो उसे प्रासन जानो अन्यथा सुखका नाश होता है । सर्व - भूतों स्वरूप विश्वके अद्वय अधिष्ठान , जिसमें सिद्धिके लिए बैठकर सिद्ध लोग सिद्धिको प्राप्त होते हैं , वही सिद्धासन कहलाता है ।
(८ ) जो सब योगी बन्धन का मूल है , वही मूल बन्ध ब्रह्म वादियों के लिये सेवन करने योग्य है ।
( ९ ) सम ब्रह्म में लीन होने को ही अंको की समता जानना चाहिये , नहीं तो सूखे बृक्ष तुल्य सिद्ध होजाना समता नहीं है.
( १० ) ज्ञानमयी दृष्टि करके जगतको ब्रह्म - मय देखे वही दृष्टि पातक उद्धार है । नासाग्र को देखने वाला उदार नहीं है । दृष्टा , दर्शन और दृष्य तीनोंही का जहां विराम हो जाता है वैसीहो दृष्टि करनी चाहिये , न कि नाशाग्र देखनेवाली।
( ११ ) चित आदि सब पदार्थों में ब्रह्म के एकत्व की भावनाओं से सब वृत्तियों का जो निषेध है वही प्राणायाम कहलाता है -प्रपंच निषेध करना रेचक कहलाता है । मैं ब्रह्म ही हैं यह वृत्ति एक प्राणायाम कहलाता है , पुनः मैं ब्रह्म हूँ इस वृत्तिकी निश्चलताका नाम ही कुम्भक प्राणायाम है , यह भी विद्वानों मात्रका है , अज्ञानियोंका प्राणायाम तो केवल मात्र स्वांस को । दबाना ही है ।
( १२ ) विषयोंमें आत्मरूपता देखकर मनसे चित्त को रन्जन करने को प्रत्याहार जानना चाहिए और इसका बारम्बार अभ्यास करना चाहिये ।
( १३ ) जहां मन जाता है वहां वहां मनसे ब्रह्मके दर्शन रूप धारणा ही रहना , परम धारणा मानी गयी है ।
(१४) मैं ब्रह्मही हूँ ऐसी सत् वृतिसे निरालंब होकर एकाग्र स्थिति होना ही ध्यान कहलाता है जो परमानंद दायक है।
[ १५ ] निविकार वृति से , फिर ब्रह्माकार वृति तथा वृति से वृति का सम्यक विस्मरण ही समाधि कहलाता है ।। इस वास्तविक आनन्द का तबतक भली विधि अभ्यास करे जबतक कि -- पुरुष का लक्ष्य क्षणभर में स्वयं प्रत्येकरूप हो जाय । जब समाधि से मुक्त होकर योगीराज सिद्ध हो जाते हैं तो तत्व स्वरूप ही इसके मन वाणी का विषय हो जाता है । भाव वृति से भावत्व है , सून्य वृति से सून्यता है अतः ब्रह्म वृति से पूर्णता का जमकर अभ्यास करें ।। इस ब्रह्म नाम्नी परमपावनी वृति को छोड़कर जीते हैं वे मनुष्य पशु के समान वृथा ही जीते हैं ।। जो इस वृति को जानते हैं और जानकर बढ़ाते है , वे सत्पुरुष धन्य और तीनों लोकों से वन्दन करने योग्य हैं । ।।
योग सिद्धांत क्या है ? yog sidhdant kya he ?
यह कल्याण भारती पुस्तक से लिखा गया लेख है।

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